Monday, November 2, 2026
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Supreme Court पहुंचा UGC के नियमों का मामला, जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को शीर्ष अदालत में चुनौती

UGC के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप है कि ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026’ में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा गैर-समावेशी है। इसमें कहा गया है कि नियम 3(सी) केवल SC, ST और OBC तक सीमित है, जिससे अन्य छात्रों और शिक्षकों को संस्थागत सुरक्षा नहीं मिलती।

UGC Act: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हाल में जारी नियमों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें आरोप लगाया गया है कि इसमें जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और संस्थागत सुरक्षा से कुछ श्रेणियों को बाहर कर दिया गया है. याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ का नियम 3 (C) गैर-समावेशी है और जो छात्र एवं शिक्षक आरक्षित श्रेणियों के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता है.

विनीत जिंदल द्वारा दाखिल याचिका में इन नियमों की इन आधार पर आलोचना की गई है कि जाति आधारित भेदभाव को सख्ती से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है.

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने का आरोप

इसमें कहा गया कि ‘जाति-आधारित भेदभाव’ का दायरा सिर्फ़ SC, ST और OBC श्रेणियों तक सीमित करके, UGC ने ‘सामान्य’ या गैर-आरक्षित श्रेणी के लोगों को संस्थागत सुरक्षा और उनकी शिकायत निवारण से असल में इनकार किया है, जिन्हें अपनी जाति की पहचान के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का भी सामना करना पड़ सकता है.

इसमें कहा गया है कि यह नियम अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि यह विनियम संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है) का उल्लंघन करता है.

सुप्रीम कोर्ट से की गई ये मांग

इसमें शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि अधिकारियों को नियम 3(C) को उसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने से रोका जाए और जाति-आधारित भेदभाव को ‘जाति-तटस्थ और संविधान अनुरूप’ तरीके से फिर से परिभाषित किया जाए.

इसमें कहा गया है, “जाति के आधार पर भेदभाव को इस तरह से परिभाषित किया जाना चाहिए कि जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार होने वाले सभी लोगों को सुरक्षा मिले, चाहे उनकी जाति की पहचान कुछ भी हो.’

याचिका में केंद्र सरकार और UGC को अंतरिम निर्देश देने की मांग की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन नियमों के तहत बनाए गए ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘समानता हेल्पलाइन’ आदि को बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध कराया जाए.

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