राजस्थान के बाड़मेर मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का मामला सामने आया। राजस्थान के बाड़मेर मेडिकल कॉलेज का ताजा मामला इसी व्यवस्था की हकीकत सामने रखता है। जूनियर विद्यार्थियों के साथ कथित रैगिंग और अपमानजनक व्यवहार की शिकायतों के बाद जांच हुई और करीब 80 विद्यार्थियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी पड़ी। कई विद्यार्थियों को हॉस्टल से बाहर किया गया, जबकि अन्य पर पढ़ाई, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों में भाग लेने को लेकर अलग-अलग अवधि की पाबंदियां लगाई गईं। बाड़मेर में ही नवंबर 2024 में भी जूनियर छात्राओं की शिकायत के बाद जांच हुई। 14 सीनियर विद्यार्थियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिनमें 8 को हॉस्टल से निष्कासित किया गया और 6 छात्राओं को चेतावनी दी गई। वैसे भरतपुर, डूंगरपुर, पाली के मेडिकल कॉलेज में भी कुछ समय जूनियर स्टूडेंट्स से रैगिंग का खुलासा हुआ था। राजस्थान यूनिवर्सिटी समेत अन्य कॉलेजों में भी रैगिंग की छोटी-मोटी घटनाएं सामने आती रहती हैं। मतलब साफ है कि रैगिंग खत्म नहीं हुई है।
मेडिकल कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के समय विद्यार्थियों से एंटी-रैगिंग शपथपत्र भरवाए जाते हैं। जगह-जगह बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते हैं कि रैगिंग अपराध है। एंटी-रैगिंग कमेटियां और स्क्वॉड बनाए जाते हैं, हेल्पलाइन की व्यवस्था होती है और नियमों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि यदि इतनी व्यवस्थाएं हैं तो फिर रैगिंग की शिकायतें लगातार सामने क्यों आ रही हैं? आखिर सीनियर होने का मतलब जूनियर पर अधिकार जताना कब और क्यों मान लिया जाता है? बाड़मेर में कॉलेज प्रशासन ने जांच के बाद शारीरिक मारपीट की पुष्टि नहीं होने की बात कही है और जबरन बाल काटने के आरोपों पर भी अपना पक्ष रखा है। लेकिन क्या किसी जूनियर को डराना, अपमानित करना या उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना रैगिंग नहीं है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि मामला आखिर सामने आने तक प्रशासन क्या कर रहा था? रैगिंग कोई ऐसी घटना नहीं होती जो अचानक एक मिनट में हो जाए। यदि सीनियर और जूनियर के बीच डर का माहौल बन रहा है, व्हाट्सएप ग्रुपों और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक गतिविधियां चल रही हैं या नए विद्यार्थियों पर किसी तरह का दबाव बनाया जा रहा है, तो एंटी-रैगिंग व्यवस्था को इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी?
बाड़मेर का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह किसी सामान्य शिक्षण संस्थान का नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेज का मामला है। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थी भविष्य के डॉक्टर हैं। जिनके हाथों में आगे चलकर मरीजों की जिंदगी और संवेदनाएं होंगी, उनके शिक्षण वातावरण में भय, अपमान और दबंगई की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर बनने की शुरुआत यदि जूनियर को नीचा दिखाने की परंपरा से होगी तो संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की उम्मीद कैसे की जाएगी? रैगिंग को कई बार ‘मजाक’, ‘इंट्रोडक्शन’ या ‘कॉलेज की पुरानी परंपरा’ कहकर हल्का बनाने की कोशिश की जाती है। यही सोच सबसे खतरनाक है। एक विद्यार्थी के लिए जो बात सीनियर को मजाक लग सकती है, वही जूनियर के लिए मानसिक प्रताड़ना और भय का कारण बन सकती है। कई मामलों में यही दबाव विद्यार्थियों को गंभीर मानसिक संकट तक पहुंचा देता है।
कार्रवाई जरूरी है, लेकिन केवल कार्रवाई काफी नहीं है। हर बार शिकायत के बाद जांच, फिर कुछ विद्यार्थियों पर निलंबन या हॉस्टल से निष्कासन कर देने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होगी। जरूरत यह जानने की है कि आखिर नए विद्यार्थी शिकायत करने से डरते क्यों हैं? क्या उन्हें भरोसा है कि शिकायत करने पर उनकी पहचान सुरक्षित रहेगी? क्या कॉलेज प्रशासन नियमित रूप से जूनियर विद्यार्थियों से अलग-अलग संवाद करता है? क्या हॉस्टल और परिसर में वास्तविक निगरानी होती है या फिर समितियां केवल कागजों में सक्रिय रहती हैं? बाड़मेर मेडिकल कॉलेज ने कार्रवाई कर एक संदेश जरूर दिया है, लेकिन यह मामला एक चेतावनी भी है। रैगिंग खत्म होने का दावा और रैगिंग का वास्तव में खत्म होना—दोनों अलग बातें हैं। जब तक हर नया विद्यार्थी बिना डर के कॉलेज और हॉस्टल में रहकर पढ़ाई नहीं कर सकता, तब तक एंटी-रैगिंग कानूनों और समितियों की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।अब जरूरत केवल दोषी विद्यार्थियों को सजा देने की नहीं, बल्कि पूरी एंटी-रैगिंग व्यवस्था की समीक्षा करने की है। प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में स्वतंत्र और गोपनीय शिकायत व्यवस्था हो, हॉस्टल की नियमित निगरानी हो, जूनियर विद्यार्थियों से सीधे संवाद किया जाए और हर शिकायत को गंभीरता से लिया जाए। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि रैगिंग की घटनाओं के बाद केवल छात्र ही नहीं, बल्कि निगरानी में चूक करने वाली व्यवस्था की जवाबदेही भी तय हो।



