(प्रज्ञा पांडे)। मध्य प्रदेश के छतरपुर में चल रहा ‘चिता आंदोलन’ अब सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि विस्थापन के खिलाफ लोगों की आखिरी पुकार बन गया है। आंदोलन के दौरान सामने आईं तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। रविवार को 11 ग्रामीण महिलाएं प्रतीकात्मक चिता पर लेट गईं, जबकि 6 महिलाओं ने गले में फंदा डालकर विरोध दर्ज कराया। उनका संदेश साफ था “न्याय दो या मृत्यु।” केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें बिना पर्याप्त मुआवजे और उचित पुनर्वास के अपनी पुश्तैनी जमीन और घर छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार की पुनर्वास नीति में कई पात्र परिवार छूट गए हैं और मुआवजे के वितरण में भी अनियमितताएं हुई हैं।
क्या है ‘चिता आंदोलन’?
5 अप्रैल से शुरू हुए इस आंदोलन में ग्रामीणों ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। पहले दिल्ली कूच की कोशिश हुई, जिसे पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद दाउधन बांध क्षेत्र के आसपास गांवों में धरना शुरू हुआ। आंदोलन के दौरान चिता सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, आकाश सत्याग्रह (अनशन) और प्रतीकात्मक फांसी जैसे प्रदर्शन किए गए। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर परियोजना प्रभावितों की मांगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं। आंदोलनकारियों का दावा है कि लगातार अनशन के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी है और उनका वजन भी तेजी से घटा है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें ‘जमीन के बदले जमीन’ और ‘गांव के बदले गांव’ का विकल्प दिया जाए। वे पुनर्वास पैकेज बढ़ाने, सभी पात्र परिवारों को मुआवजा देने, सर्वे प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के प्रावधानों का पूरी तरह पालन करने की मांग कर रहे हैं।
क्यों विवादों में है केन-बेतवा परियोजना?
करीब 44,600 करोड़ रुपये की लागत वाली केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को बुंदेलखंड की जल समस्या का बड़ा समाधान बताया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और जलविद्युत उत्पादन संभव होगा। हालांकि, परियोजना का दूसरा पक्ष भी उतना ही बड़ा है। अनुमान है कि 22 गांव प्रभावित होंगे, जिनमें 10 गांव पूरी तरह डूब क्षेत्र में आ जाएंगे। इससे 7,000 से अधिक परिवारों के विस्थापित होने की आशंका है। परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा भी जलमग्न होगा, जिसे लेकर पर्यावरणविद लगातार सवाल उठा रहे हैं।
सरकार का क्या कहना है?
मध्य प्रदेश सरकार का कहना है कि भूमि अधिग्रहण और मुआवजा वितरण 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक, अधिकांश प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया जा चुका है और जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उनके लिए पूरक सर्वे और अतिरिक्त सूची तैयार की जा रही है। प्रशासन का दावा है कि परियोजना के सभी पर्यावरणीय और कानूनी अनुमोदन नियमानुसार प्राप्त किए गए हैं। प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत के बाद कुछ दौर में आंदोलन स्थगित भी हुआ था, लेकिन प्रभावित परिवारों का कहना है कि जब तक उनकी पुनर्वास और मुआवजे से जुड़ी मांगों का ठोस समाधान नहीं होगा, उनका विरोध जारी रहेगा। छतरपुर का ‘चिता आंदोलन’ अब सिर्फ एक स्थानीय आंदोलन नहीं, बल्कि विकास परियोजनाओं की कीमत और विस्थापन के सवाल पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।



