नई दिल्ली। वैवाहिक बलात्कार यानी Marital Rape को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई चल रही है। मामला इस सवाल से जुड़ा है कि क्या पति को शादी के रिश्ते के आधार पर रेप के आरोप से मिली कानूनी छूट जारी रहनी चाहिए या इसे खत्म किया जाना चाहिए। इस मामले में अदालत का फैसला महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक संबंधों से जुड़े आपराधिक कानून पर दूरगामी असर डाल सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस मुद्दे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। अदालत के सामने यह सवाल भी है कि जब मौजूदा कानून पति को एक विशेष अपवाद देता है, तो उस प्रावधान के रहते उसके खिलाफ रेप का मुकदमा किस आधार पर चलाया जा सकता है।
महिला की सहमति पर बड़ा सवाल
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि शादी के बाद भी महिला को अपने शरीर और यौन संबंधों के बारे में निर्णय लेने का अधिकार रहता है। विवाह किसी महिला की सहमति के अधिकार को खत्म नहीं करता। उनका कहना है कि जबरन बनाए गए यौन संबंध को केवल वैवाहिक रिश्ता होने के कारण अलग कानूनी दर्जा नहीं मिलना चाहिए।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने जैसा बड़ा बदलाव संसद के जरिए किया जाना चाहिए। सरकार ने विवाह संस्था, कानून के संभावित दुरुपयोग और ऐसे मामलों में सबूत जुटाने से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों का भी मुद्दा उठाया है।
BNS में क्या है प्रावधान?
IPC की जगह लागू भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 63 में भी वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा अपवाद मौजूद है। मौजूदा व्यवस्था में वयस्क पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया यौन संबंध रेप की परिभाषा के अपवाद में रखा गया है। इसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला भी महत्वपूर्ण है, जिसमें एक पति के खिलाफ पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के आरोप में रेप का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे कानूनी विवाद पर विचार कर रहा है।
अदालत का फैसला यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है कि विवाह के भीतर महिला की सहमति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौजूदा आपराधिक कानून के बीच कानूनी संतुलन किस तरह बनाया जाए।



