(प्रज्ञा पांडे)। मुंबई की बारिश में एक ऐसा दिन आया, जब पूरा देश उदास हो गया था। हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जाने वाले राजेश खन्ना ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। 69 साल के राजेश खन्ना ने अपने बांद्रा स्थित घर ‘आशीर्वाद’ में आखिरी सांस ली। उनके जाने की खबर फैलते ही उनके घर के बाहर हजारों प्रशंसकों की भीड़ जमा हो गई थी। वो सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक दौर थे। ऐसा दौर जब उनकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार करते थे, उनकी तस्वीरों को संभालकर रखते थे और उनकी फिल्मों के गाने लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते थे।
आखिरी विदाई भी किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थी
राजेश खन्ना के निधन के बाद उनकी आखिरी यात्रा में मुंबई उमड़ पड़ी थी। तेज बारिश के बावजूद फैंस सड़कों पर खड़े रहे। सफेद फूलों से सजे वाहन में जब ‘काका’ निकले तो लोगों की आंखों में आंसू थे और हाथों में फूल। 19 जुलाई 2012 को उनका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार और लाखों चाहने वालों ने नम आंखों से अपने पसंदीदा सितारे को आखिरी विदाई दी। उनकी अंतिम विदाई में एक ऐसा भाव था, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। जिस शख्स ने पर्दे पर लाखों लोगों को प्यार करना सिखाया, उस शख्स के जाने पर पूरा देश रो रहा था। राजेश खन्ना के आखिरी पलों से जुड़ा एक किस्सा आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है। उनके करीबी ने बताया था कि जाने से पहले उन्होंने कहा था- “टाइम हो गया है, पैकअप।” अमिताभ बच्चन ने भी अपने ब्लॉग में इस बात का जिक्र किया था कि राजेश खन्ना के करीबी व्यक्ति ने उन्हें ये बात भावुक होकर बताई थी। एक अभिनेता के लिए शूटिंग खत्म होने पर बोला जाने वाला शब्द, उनकी जिंदगी के आखिरी संवाद जैसा बन गया।
आखिरी दिनों में सिर्फ घर लौटना चाहते थे ‘काका’
निधन से पहले राजेश खन्ना लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया। लीलावती अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह अपने घर आशीर्वाद लौटे थे। उनके परिवार के लोग उनके साथ थे। कहा जाता है कि उस समय उनकी सबसे बड़ी इच्छा अपने घर में रहने की थी। शायद वह अपने आखिरी पल उसी जगह बिताना चाहते थे, जहां उन्होंने जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल गुजारे थे। 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था। बचपन में उनका पालन-पोषण रिश्तेदारों ने किया। मुंबई में पले-बढ़े जतिन को बचपन से ही अभिनय का शौक था। थिएटर से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें हिंदी सिनेमा के इतिहास के सबसे बड़े सितारों में ले गया। 1965 में टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतने के बाद फिल्मों के रास्ते खुले और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1969 में आई फिल्म ‘आराधना’ ने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार बना दिया। इसके बाद ‘कटी पतंग’, ‘आनंद’, ‘अमर प्रेम’, ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर का नाम बना दिया।
ऐसा स्टारडम जिसे देखकर दुनिया हैरान थी
राजेश खन्ना की लोकप्रियता किसी जुनून से कम नहीं थी। उनके घर रोज हजारों खत आते थे। लड़कियां उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करती थीं। उनकी कार के पीछे भीड़ चलती थी। उनके गाने रेडियो पर आते ही लोग रुक जाते थे। यही वजह थी कि उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा गया। राजेश खन्ना की सबसे यादगार फिल्मों में से एक थी ‘आनंद’। फिल्म में उनका किरदार जिंदगी को मुस्कुराते हुए जीने का संदेश देता है।शायद यही वजह है कि राजेश खन्ना के जाने के बाद भी उनके चाहने वाले उन्हें सिर्फ उनकी मौत से नहीं, बल्कि उनकी मुस्कान, उनकी फिल्मों और उनके अंदाज से याद करते हैं।
उनका संवाद- “बाबूमोशाय, जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए” आज भी लोगों के दिलों में गूंजता है।
एक सितारा जो पर्दे से आगे दिलों में बस गया
राजेश खन्ना की जिंदगी में शोहरत भी थी और अकेलापन भी। उन्होंने आसमान जैसी सफलता देखी, लेकिन निजी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव भी आए। फिर भी उनके आखिरी सफर में जो प्यार मिला, उसने साबित कर दिया कि कुछ कलाकार सिर्फ फिल्में नहीं बनाते, वे लोगों की यादों का हिस्सा बन जाते हैं। ‘काका’ आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में, उनके गीत और उनका अंदाज हमेशा जिंदा रहेगा। क्योंकि कुछ सितारे सिर्फ चमकते नहीं…वे एक पूरी पीढ़ी की याद बन जाते हैं।



