नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई का मामला स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने चल रही कार्यवाही के कारण चर्चा में है। दोनों नेताओं ने अपनी हिरासत बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन 21 अक्टूबर 2026 को अदालत की टिप्पणी के बाद उन्होंने अपनी याचिका वापस ले ली। हाईकोर्ट ने उन्हें उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी। ऐसे में सवाल उठता है कि SEM कोर्ट आखिर क्या है? क्या यह सामान्य अदालत की तरह मुकदमों की सुनवाई करती है या इसकी भूमिका अलग होती है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।
क्या है SEM कोर्ट?
SEM का पूरा नाम Special Executive Magistrate यानी स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट है। यह सामान्य आपराधिक अदालत की तरह काम नहीं करता, बल्कि कानून के तहत सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कार्रवाई कर सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 15 के तहत विशेष कार्यों या निर्धारित क्षेत्रों के लिए स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट नियुक्त किए जा सकते हैं। उन्हें कानून के तहत निर्धारित शक्तियां ही इस्तेमाल करने का अधिकार होता है।
सौरव दास और आशुतोष रांका का मामला SEM कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर सुरक्षा व्यवस्था तोड़ने और प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने के मामले में हिरासत में लिया गया था। इसके बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया। 19 अक्टूबर को SEM ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी थी। इसके बाद दोनों नेताओं ने हिरासत बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। 21 अक्टूबर को हाईकोर्ट में याचिका वापस लेने के बाद उनके वकीलों को SEM की कार्यवाही के परिणाम का इंतजार करने और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी गई।
SEM कोर्ट के पास कौन-कौन सी शक्तियां होती हैं?
BNSS की धारा 126 से 143 तक सार्वजनिक शांति बनाए रखने और शांति भंग होने की आशंका से जुड़े विभिन्न प्रावधान हैं। इनके तहत संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट परिस्थितियों के अनुसार किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकते हैं और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि SEM की शक्तियां असीमित नहीं होतीं। वे केवल कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के दायरे में काम कर सकते हैं। किसी मामले में हिरासत या बॉन्ड से जुड़ा आदेश भी लागू कानूनी प्रावधानों और प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।
सामान्य कोर्ट और SEM कोर्ट में क्या अंतर है?
सामान्य न्यायिक अदालत और SEM के काम में बुनियादी अंतर होता है।
- सामान्य न्यायिक अदालत: आपराधिक मामलों में सुनवाई करती है, साक्ष्यों और कानून के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि या बरी होने जैसे मुद्दों पर निर्णय देती है।
- SEM: मुख्य रूप से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका को रोकने के लिए कानून के तहत एहतियाती कार्यवाही करता है।
- अधिकार क्षेत्र: सामान्य अदालतों और कार्यकारी मजिस्ट्रेटों की शक्तियां अलग-अलग कानूनी प्रावधानों से तय होती हैं।
- कानूनी चुनौती: SEM के आदेशों को भी कानून के अनुसार उपलब्ध अपील, पुनरीक्षण या अन्य उचित कानूनी उपायों के जरिए चुनौती दी जा सकती है।
इसलिए SEM को सामान्य आपराधिक अदालत के समान समझना सही नहीं होगा। उसकी भूमिका और अधिकार कानून में निर्धारित हैं।
थाने में SEM कोर्ट होने का क्या मतलब है?
कई जगह SEM की कार्यवाही पुलिस स्टेशन परिसर में स्थित कार्यालय में होती है। सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले में भी मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन स्थित SEM के सामने कार्यवाही हुई थी। लेकिन किसी पुलिस स्टेशन में SEM का कार्यालय होने का अर्थ यह नहीं है कि वह सामान्य अदालत बन जाता है। कार्यवाही की प्रकृति, मजिस्ट्रेट के अधिकार और संबंधित क्षेत्राधिकार कानून से तय होते हैं।



