कोटा। राजस्थानी भाषा और हाड़ौती साहित्य के प्रसिद्ध कवि एवं गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे गौड़ का कोटा के एक निजी अस्पताल में उपचार चल रहा था। रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही राजस्थान के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर फैल गई। साहित्य प्रेमियों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
दुर्गादान सिंह गौड़ को राजस्थानी साहित्य में विशेष पहचान हासिल थी। उन्हें ‘गीत ऋषि’ और ‘हाड़ौती के कालिदास’ जैसे सम्मानजनक संबोधनों से जाना जाता था। अपनी लेखनी और गायन के माध्यम से उन्होंने हाड़ौती की लोकभाषा, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं को व्यापक मंच दिया। उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज, अकाल की त्रासदी, प्रेम, शृंगार और आम जनजीवन की भावनाओं की प्रभावी झलक दिखाई देती थी।
गौड़ का जन्म झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के जोलपा गांव में हुआ था। सोमवार दोपहर करीब एक बजे उनके पैतृक गांव जोलपा में अंतिम संस्कार किया गया। वे अपने पीछे चार बेटों और दो बेटियों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। अंतिम विदाई के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, साहित्य प्रेमी और उनके परिचित मौजूद रहे।
रचनाओं ने बनाई अलग पहचान
दुर्गादान सिंह गौड़ की साहित्यिक यात्रा कई दशकों तक चली। उनकी ‘पाणी में चांद घुले’ सहित दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं। वहीं ‘राधे-राधे’ और ‘रेखाचित्र’ नामक उनकी दो अन्य कृतियां प्रकाशन की प्रक्रिया में थीं। उनकी रचनाओं ने राजस्थानी भाषा को सहज, जीवंत और जनसरोकारों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साठ के दशक में अकाल की मार झेल रहे ग्रामीण समाज की पीड़ा को उन्होंने अपनी रचनाओं में आवाज दी। उनका अकाल पर आधारित गीत आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। इसके अलावा साठ और सत्तर के दशक में उनके कई लोकगीतों ने श्रोताओं के बीच गहरी छाप छोड़ी। उनके शृंगार गीतों ने राजस्थानी काव्य की इस परंपरा को भी समृद्ध किया।
साहित्य जगत ने जताया दुख
गौड़ के निधन पर साहित्यकारों, राजनेताओं और उनके प्रशंसकों ने शोक व्यक्त किया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनके निधन को राजस्थान के साहित्य और संस्कृति के लिए बड़ी क्षति बताया। प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी साहित्यिक साधना और लोकभाषा के प्रति योगदान को याद किया।
दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन राजस्थानी साहित्य, विशेषकर हाड़ौती की लोक और शृंगार काव्य परंपरा के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को राजस्थान की लोकसंस्कृति और जनजीवन से जोड़ने वाली साहित्यिक विरासत के रूप में याद की जाती रहेंगी।



