जयपुर। राजस्थान में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने के मामले में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इनमें जालोर जिले के रानीवाड़ा निवासी नानजीराम चौधरी पर आरोप है कि वह केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ा है, लेकिन कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के जरिए राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) में डॉक्टर के रूप में पंजीकृत हो गया। वह रानीवाड़ा में भास्कर हॉस्पिटल भी संचालित करता था।
दूसरे आरोपी पंकज यादव पर आरोप है कि उसने कजाकिस्तान से MBBS करने के बाद जरूरी विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) पास नहीं की। इसके बाद उसने कथित तौर पर बिहार की एक मेडिकल यूनिवर्सिटी के नाम से फर्जी डिग्री और अन्य दस्तावेज तैयार करवाए और उनके आधार पर राजस्थान मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण कराया। SOG अब इस मामले में अन्य संदिग्धों और मेडिकल काउंसिल के तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है।

आठवीं पास आरोपी ने कैसे खड़ा किया अस्पताल का कारोबार?
SOG की जांच के मुताबिक, नानजीराम चौधरी ने करीब 2010 में रानीवाड़ा के एक निजी डॉक्टर के क्लिनिक में मरीजों की पर्चियां बनाने का काम शुरू किया था। इसके बाद उसने कुछ समय तक रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर भी काम किया। वर्ष 2014 में वह रानीवाड़ा के राजदेव हॉस्पिटल के ओपीडी काउंटर पर पर्चियां काटने लगा।
जांच में आरोप है कि 2015 में उसने अस्पताल के तत्कालीन मालिक से अस्पताल खरीद लिया और अगले साल उसका नाम बदलकर भास्कर हॉस्पिटल रख दिया। शुरुआत में वहां जनरल मेडिसिन के डॉक्टर काम करते थे। वर्ष 2019 में अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ की सेवाएं भी शुरू की गईं।
SOG के अनुसार, नानजीराम ने बाद में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राजस्थान मेडिकल काउंसिल में अपना पंजीकरण करा लिया। जांच एजेंसी का कहना है कि इस मामले में उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का संबंधित संस्थानों से सत्यापन कराया गया, जिसमें कई दस्तावेज फर्जी पाए गए।
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दसवीं से MBBS तक के दस्तावेजों पर उठे सवाल
जांच में सामने आया कि नानजीराम चौधरी ने दसवीं और बारहवीं की अंकतालिकाओं के साथ MBBS की डिग्री और स्त्री रोग एवं प्रसूति विज्ञान में डिप्लोमा के दस्तावेज भी जमा कराए थे। इन दस्तावेजों में आंध्र प्रदेश सेकेंडरी बोर्ड, रामा यूनिवर्सिटी कानपुर और द कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स, मुंबई से संबंधित प्रमाणपत्र शामिल बताए गए हैं।
SOG के मुताबिक, मुंबई स्थित संस्था से सत्यापन में डिप्लोमा प्रमाणपत्र, अलॉटमेंट लेटर, पासिंग सर्टिफिकेट और परीक्षा में शामिल होने से संबंधित दस्तावेज फर्जी पाए गए। आरोपी ने ये दस्तावेज कहां से और किसकी मदद से हासिल किए, इसकी जांच की जा रही है। मामले में यह भी पता लगाया जा रहा है कि फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण कैसे हुआ और उस दौरान किन लोगों की भूमिका रही।
छह बार FMGE परीक्षा दी, लेकिन पास नहीं हुआ पंकज यादव
इस मामले में गिरफ्तार दूसरे आरोपी पंकज यादव की कहानी भी जांच एजेंसी के मुताबिक फर्जी दस्तावेजों से जुड़ी है। SOG के अनुसार, पंकज ने वर्ष 2013 से 2018 के बीच कजाकिस्तान में MBBS की पढ़ाई की थी। भारत लौटने के बाद उसने विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) छह बार दी, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
आरोप है कि इसके बाद उसने बिहार के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज, मुजफ्फरपुर के नाम से MBBS की फर्जी डिग्री और अंकतालिका तैयार करवाई। उसने बिहार मेडिकल काउंसिल का कथित फर्जी पंजीकरण प्रमाणपत्र भी बनवाया और इसी आधार पर राजस्थान मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण कराया।
SOG ने संबंधित मेडिकल संस्थानों और विश्वविद्यालयों से दस्तावेजों का सत्यापन कराया। जांच में आरोपी के नाम पर डिग्री और अंकतालिका का रिकॉर्ड नहीं मिला तथा दस्तावेज फर्जी पाए गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए पंकज यादव हरियाणा के कैथल में रह रहा था, जहां से उसे गिरफ्तार किया गया।

मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण को लेकर भी जांच
इस पूरे मामले की शुरुआत राजस्थान मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार डॉ. गिरिधर गोपाल की शिकायत से हुई थी। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, 6 अक्टूबर 2024 को जयपुर के अशोक नगर थाने में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने का मामला दर्ज कराया गया था। शुरुआत में आठ लोगों के नाम सामने आए थे। बाद में जांच के दौरान नानजीराम चौधरी के कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीकरण कराने की जानकारी भी सामने आई।
इसके बाद मामले की जांच SOG को सौंप दी गई। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि आरोपियों ने दस्तावेज कहां से बनवाए, उन्हें पंजीकरण दिलाने में किन लोगों ने मदद की और राजस्थान मेडिकल काउंसिल के तत्कालीन अधिकारियों या कर्मचारियों की इसमें कोई भूमिका थी या नहीं।
मामले में शांतनु कुमार चारण, दीपक चौधरी, देवेंद्र नेहरा, गीता कुमारी, महेश कुमार गुर्जर, सरीमूल मजूमदार और रामकिशोर महावर सहित अन्य आरोपियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने का यह मामला चिकित्सा व्यवस्था की निगरानी और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि किसी व्यक्ति ने आवश्यक शैक्षणिक योग्यता और मान्य डिग्री के बिना डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराया, तो यह मरीजों की सेहत के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
हालांकि, गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा। फिलहाल SOG दस्तावेजों के स्रोत, कथित फर्जीवाड़े के नेटवर्क और पंजीकरण प्रक्रिया में संभावित मिलीभगत की जांच कर रही है। मामले में आगे और खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।



