जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव को लेकर नामांकन वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भाजपा और कांग्रेस की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। दोनों प्रमुख दलों ने बगावत रोकने के लिए बड़े स्तर पर डैमेज कंट्रोल किया, लेकिन इसके बावजूद सैकड़ों बागी चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। बागियों की मौजूदगी से कई वार्डों और निकायों में चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना बन गई है। खासकर उन सीटों पर अधिक असर पड़ सकता है, जहां टिकट नहीं मिलने से नाराज पुराने और प्रभावशाली कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है।
भाजपा ने 1,000 से ज्यादा बागियों को मनाया, 450 अब भी मैदान में
भाजपा ने बगावत को नियंत्रित करने के लिए बड़े स्तर पर मान-मनौव्वल की। पार्टी 1,000 से ज्यादा बागियों को नामांकन वापस लेने के लिए राजी करने में सफल रही। हालांकि इसके बावजूद 450 से अधिक बागी प्रत्याशी चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। इन प्रत्याशियों की मौजूदगी भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों के लिए कई सीटों पर चुनौती बन सकती है। पार्टी ने बागियों को मनाने और अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की जिम्मेदारी विधायकों, विधायक प्रत्याशियों, जिला अध्यक्षों और प्रभारियों को दी थी।
कांग्रेस के 610 बागी अभी भी चुनाव मैदान में
कांग्रेस में भी बगावत का असर देखने को मिल रहा है। पार्टी ने 432 बागियों को नामांकन वापस लेने के लिए राजी किया, लेकिन 610 से ज्यादा बागी अब भी मैदान में बने हुए हैं। नाम वापसी की समय सीमा समाप्त होने के बाद अब कांग्रेस के सामने अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने और बागी उम्मीदवारों से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने की चुनौती है।
बागियों से कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला
भाजपा और कांग्रेस के बागी प्रत्याशियों की मौजूदगी से कई वार्डों में मुकाबला अब सीधे दो प्रत्याशियों के बीच नहीं रहेगा। मजबूत स्थानीय पकड़ रखने वाले बागी उम्मीदवार यदि अपने समर्थकों और पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होते हैं, तो चुनाव परिणाम पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। भाजपा के अंदरूनी आकलन के मुताबिक टिकट कटने से नाराज कई पुराने कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। इनमें कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिनकी स्थानीय स्तर पर अच्छी पकड़ है। ऐसे में पार्टी के लिए चुनौती केवल बागियों की संख्या नहीं है, बल्कि यह भी है कि कितने बागी भाजपा के परंपरागत वोट बैंक को प्रभावित कर पाते हैं।
आरएलपी ने उतारे 1,000 से ज्यादा प्रत्याशी
निकाय चुनाव में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने भी अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की है। पार्टी ने 1,000 से अधिक प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है। यह संख्या पिछले निकाय चुनाव की तुलना में आठ गुना से अधिक बताई जा रही है। पिछली बार पार्टी ने करीब 125 प्रत्याशियों को टिकट दिया था। आरएलपी प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में प्रत्याशियों का मैदान में उतरना इस बात का संकेत है कि जनता मजबूत तीसरे राजनीतिक विकल्प की ओर देख रही है।
भाजपा ने मांगी बागियों की पूरी रिपोर्ट
नामांकन वापसी की प्रक्रिया खत्म होने के बाद भाजपा संगठन ने बागी प्रत्याशियों का रिकॉर्ड जुटाना शुरू कर दिया है। प्रदेश नेतृत्व ने सभी जिला अध्यक्षों और प्रभारियों से बागी उम्मीदवारों की सूची मांगी है। पार्टी यह जानकारी भी जुटा रही है कि किस निकाय और वार्ड में कौन सा बागी प्रत्याशी मैदान में है और उसका स्थानीय प्रभाव कितना है। चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ने या पार्टी उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
आचार संहिता तोड़ी तो होगी कार्रवाई
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह की अध्यक्षता में गुरुवार को सचिवालय में पर्यवेक्षकों की प्रशिक्षण बैठक आयोजित हुई। इसमें पर्यवेक्षकों को निर्वाचन प्रक्रिया पर लगातार निगरानी रखने और स्थानीय अधिकारियों के साथ बेहतर समन्वय के निर्देश दिए गए। चुनाव पर्यवेक्षण की प्रक्रिया दो चरणों में होगी। पहला चरण 7 से 14 सितंबर तक सदस्य पद की मतगणना पूरी होने तक चलेगा। वहीं दूसरा चरण 21 से 22 सितंबर तक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्वाचन तक रहेगा। निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन पर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
बागियों की भूमिका पर टिकी कई सीटों की सियासी बाजी
निकाय चुनाव में अब नाम वापसी का दौर खत्म हो चुका है और प्रत्याशियों की तस्वीर स्पष्ट हो गई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अब अपने अधिकृत उम्मीदवारों को मजबूत करने की चुनौती है। कई सीटों पर बागी प्रत्याशी जीत-हार का समीकरण बदल सकते हैं। अगर बागी अपने-अपने दलों के पारंपरिक वोट में सेंध लगाने में सफल रहे, तो सीधी लड़ाई त्रिकोणीय मुकाबले में बदल सकती है और इसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।



