जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव की नामांकन प्रक्रिया अपने आखिरी दौर में पहुंच चुकी है। 31 अगस्त नामांकन की अंतिम तारीख है और इसके साथ ही टिकट को लेकर राजनीतिक दलों के भीतर चल रही खींचतान भी खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में दावेदारों की लंबी कतार के बीच नाराजगी, खेमेबाजी और बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं।
कांग्रेस जहां करीब 90 फीसदी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियों के चयन का दावा कर रही है, वहीं पार्टी ने बगावत रोकने के लिए रणनीति तैयार करने की कवायद तेज कर दी है। इसी बीच शनिवार को जयपुर स्थित कांग्रेस वॉर रूम में भीलवाड़ा के शहरी निकायों के टिकटों को लेकर हुई बैठक में दो वरिष्ठ नेताओं के बीच विवाद की खबर सामने आई। मामला इतना बढ़ गया कि प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली को बीच-बचाव करना पड़ा।

भीलवाड़ा के टिकट पर आमने-सामने आए रामलाल जाट और धीरज गुर्जर
बैठक में पूर्व मंत्री रामलाल जाट और पूर्व विधायक धीरज गुर्जर के बीच किसी मुद्दे को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई। बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के साथ बैठने तक से इनकार कर दिया। बातचीत आगे बढ़ी तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया और मामला कथित तौर पर अभद्र भाषा तक पहुंच गया।
विवाद के दौरान रामलाल जाट ने धीरज गुर्जर पर गंभीर आरोप लगाए और उन्हें ‘गुंडा’ तक कह दिया। इसके जवाब में धीरज गुर्जर ने भी पलटवार किया और रामलाल जाट के चरित्र पर सवाल उठाए। दोनों नेताओं के बीच काफी देर तक तीखी नोकझोंक चलती रही। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, बैठक के दौरान दोनों पक्षों की आवाज इतनी तेज थी कि वॉर रूम के दूसरे हिस्सों तक भी विवाद की आवाज पहुंच गई। हालांकि बाद में डोटासरा और जूली ने हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाल लिया।
गहलोत और पायलट खेमे की पुरानी खींचतान फिर चर्चा में
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी एक बार फिर चर्चा में आ गई है। रामलाल जाट को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी नेताओं में गिना जाता है, जबकि धीरज गुर्जर को सचिन पायलट खेमे से जोड़कर देखा जाता रहा है। भीलवाड़ा की स्थानीय राजनीति में दोनों नेताओं के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं माने जाते। चुनावी दौर में दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच खेमेबाजी की चर्चा भी सामने आती रही है। ऐसे में निकाय चुनाव से ठीक पहले सामने आया यह विवाद पार्टी के लिए चुनौती बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

भाजपा में भी नेताओं के पार्टी छोड़ने से बढ़ी चिंता
दूसरी तरफ भाजपा में भी टिकट वितरण को लेकर असंतोष के संकेत मिल रहे हैं। दौसा जिले के लालसोट में भाजपा के पूर्व वाइस चेयरमैन पुरुषोत्तम जोशी और भाजपा नेता दिनेश जोशी ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। दोनों के कांग्रेस में जाने से स्थानीय निकाय चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदलने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। पाली में भी भाजपा को झटका लगा है। पांच बार पार्षद रह चुके राकेश भाटी कांग्रेस में शामिल हो गए। निकाय चुनाव से ठीक पहले नेताओं के इस तरह पाला बदलने से भाजपा के सामने भी दावेदारों और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की चुनौती बढ़ गई है।
भाजपा में टिकटों को लेकर चल रहा मंथन
भाजपा की ओर से प्रत्याशियों के चयन को लेकर संभागवार बैठकों का दौर जारी है। अजमेर, उदयपुर और बीकानेर के बाद कोटा और जोधपुर संभाग के निकायों के लिए प्रत्याशियों के नाम तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं भरतपुर और जयपुर संभाग के कुछ निकायों को लेकर चयन प्रक्रिया जारी बताई जा रही है। जयपुर नगर निगम के सिविल लाइंस क्षेत्र के वार्डों को लेकर भी पार्टी के भीतर चर्चाएं तेज हैं। इस बीच यह दावा सामने आया कि सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा ने अपने स्तर पर कुछ दावेदारों को प्रत्याशी के तौर पर आगे बढ़ाया और उन्हें माला पहनाई। हालांकि भाजपा की ओर से ऐसे किसी आधिकारिक ऐलान से इनकार किया गया है।
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भाजपा ने नोटिस की चर्चा को बताया गलत
भाजपा के प्रदेश निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी ने किसी विधायक को कारण बताओ नोटिस दिए जाने की बात से इनकार किया। उनका कहना है कि पार्टी ने अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, इसलिए अनुशासनहीनता का सवाल भी नहीं उठता। द्विवेदी के मुताबिक, पार्टी में फिलहाल किसी बड़े विरोध की सूचना नहीं है और 31 अगस्त को भाजपा के 10 हजार से ज्यादा उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल करने की तैयारी है।
आखिरी दिन तक बदल सकते हैं सियासी समीकरण
राजस्थान निकाय चुनाव में नामांकन की अंतिम तारीख अब बेहद करीब है। ऐसे में अगले कुछ घंटे कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अहम माने जा रहे हैं। टिकट से नाराज दावेदारों को मनाने से लेकर बागियों को रोकने तक, दोनों दलों के सामने कई चुनौतियां हैं। कांग्रेस में गहलोत और पायलट खेमे से जुड़े नेताओं के बीच सामने आई तकरार और भाजपा में नेताओं के पाला बदलने से यह साफ है कि निकाय चुनाव सिर्फ मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की लड़ाई नहीं है, बल्कि दोनों दलों के भीतर संगठनात्मक पकड़ और गुटबाजी की भी बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। अब देखना होगा कि नामांकन की आखिरी तारीख तक कौन-कौन से चेहरे मैदान में उतरते हैं और टिकट से नाराज नेता किस पार्टी का खेल बिगाड़ते हैं।



