लखनऊ (प्रज्ञा पांडे)। उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वाकांक्षी और महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, एक्सप्रेसवे शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर करीब 84 स्थानों पर सड़क धंसने या सतह में खराबी की शिकायतें सामने आई हैं। इन दावों के बाद परियोजना की गुणवत्ता, निगरानी और निर्माण प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, संबंधित विभागों की ओर से इन दावों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया और जांच रिपोर्ट का इंतजार है।
रिपोर्टों के अनुसार, एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के 18 दिनों के भीतर कई स्थानों पर सड़क धंसने और सतह खराब होने की शिकायतें दर्ज की गईं। इस मामले ने राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यह मुद्दा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश की सड़कों को विश्वस्तरीय बनाने की बात कही थी।
गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे है, जिसकी लंबाई करीब 594 किलोमीटर है। यह मेरठ को प्रयागराज से जोड़ता है और इसकी अनुमानित लागत 46 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है। इस परियोजना का उद्देश्य पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच तेज और बेहतर सड़क संपर्क उपलब्ध कराना है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि एक्सप्रेसवे के निर्माण से जुड़े कुछ कार्यों का ठेका ऐसी कंपनी को मिला, जिसका संबंध एक भाजपा सांसद के भाई से बताया जा रहा है।
हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित पक्षों की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आई है। ठेका प्रक्रिया या निर्माण में किसी भी तरह की अनियमितता की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी सड़क परियोजनाओं में मिट्टी की गुणवत्ता, जल निकासी व्यवस्था, निर्माण सामग्री और तकनीकी मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण होता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सड़क धंसने के दावे सही हैं, तो इतनी बड़ी लागत से तैयार एक्सप्रेसवे में इतनी जल्दी खराबी क्यों आई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी। फिलहाल मामले को लेकर जांच और आधिकारिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।



