भरतपुर। नगर निगम चुनाव में टिकट वितरण के बाद BJP के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के कई पुराने और संगठन से जुड़े नेताओं ने टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। इससे BJP के सामने अपने ही नेताओं को साधने की चुनौती खड़ी हो गई है।
बागी नेताओं में संगठन के अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारी संभाल चुके पदाधिकारी और पुराने कार्यकर्ता शामिल हैं। इनमें पूर्व नेता प्रतिपक्ष कपिल फौजदार का नाम प्रमुखता से सामने आया है। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे कई वार्डों में मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
पार्टी के मंडल स्तर से जुड़े कुछ नेताओं ने भी BJP के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ ताल ठोक दी है। मंडल अध्यक्ष रह चुके चंद्रवीर जघीना और संजीव शर्मा समेत कई अन्य नेताओं के निर्दलीय मैदान में उतरने से संगठन के सामने नई चुनौती पैदा हुई है।
टिकट वितरण से नाराज नेताओं ने चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। कुछ बागी नेताओं का आरोप है कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। उनका दावा है कि कई जगह पुराने और सक्रिय कार्यकर्ताओं की जगह दूसरे दावेदारों को प्राथमिकता दी गई, जिसके कारण असंतोष बढ़ा।
BJP संगठन ने बगावत को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। पार्टी की ओर से चुनाव में अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ उतरने वाले पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की जानकारी प्रदेश संगठन तक पहुंचाई गई है। कुछ पदाधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियों से हटाकर नए लोगों को संगठन में भूमिका दिए जाने की बात भी सामने आई है।
अब BJP के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को अपने आधिकारिक उम्मीदवारों के पक्ष में मजबूत चुनावी माहौल बनाना है, वहीं दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में सामने आए अपने पुराने नेताओं के प्रभाव को कम करना होगा।
बागी प्रत्याशी अगर अपने व्यक्तिगत जनाधार और पार्टी से जुड़े पुराने समर्थकों को वोट में बदलने में सफल रहते हैं, तो BJP के वोटों में सेंध लग सकती है। खासकर करीबी मुकाबले वाले वार्डों में कुछ वोटों का बंटवारा भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकता है।
भरतपुर नगर निगम चुनाव में इसलिए BJP की असली परीक्षा सिर्फ विपक्षी दलों के सामने नहीं है। टिकट वितरण के बाद पैदा हुआ असंतोष और बागियों का मैदान में बने रहना पार्टी की चुनावी रणनीति के लिए बड़ा मुद्दा बन गया है। अब देखना होगा कि BJP नेतृत्व नाराज नेताओं को मनाने में कितना सफल होता है और निर्दलीय उम्मीदवारों की चुनौती का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ता है।



