Tuesday, September 1, 2026
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PM Modi Kyrgyzstan Visit: ‘मक्का गैंग’ के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक चाल! ईरान-आर्मीनिया से मुलाकात के पीछे क्या है प्लान?

PM Modi की किर्गिस्तान यात्रा के दौरान ईरान, आर्मीनिया और किर्गिस्तान के नेताओं से मुलाकात को भारत की बड़ी कूटनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। चाबहार, INSTC और मध्य एशिया के जरिए भारत क्षेत्र में अपने रणनीतिक विकल्प मजबूत कर रहा है।

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किर्गिस्तान यात्रा को सामान्य राजनयिक दौरे से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बिश्केक में पीएम मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव से अलग-अलग मुलाकात की। देखने में ये तीनों बैठकें अलग-अलग लग सकती हैं, लेकिन इनके पीछे भारत की व्यापक रणनीतिक और कूटनीतिक सोच नजर आती है। यह रणनीति पश्चिम एशिया से ईरान, दक्षिण कॉकस और फिर मध्य एशिया तक भारत की रणनीतिक पहुंच मजबूत करने से जुड़ी मानी जा रही है। खास बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय हो रहा है, जब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच नए रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय समीकरणों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

‘मक्का गैंग’ के नए समीकरण का क्या मतलब?

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुआ रक्षा समझौता पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के बदलते सुरक्षा समीकरणों में अहम माना जा रहा है। इस समझौते से तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और रणनीतिक समन्वय मजबूत होने की संभावना है। पाकिस्तान के लिए यह समझौता सऊदी अरब और तुर्किए के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने का अवसर है। वहीं तुर्किए पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सऊदी अरब बदलती क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में नए विकल्प तलाश रहा है।

भारत किसी एक गुट का हिस्सा क्यों नहीं बनना चाहता?

भारत इस तरह के बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच किसी एक सैन्य या रणनीतिक गुट में शामिल होने के बजाय बहु-आयामी और स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर देता रहा है। नई दिल्ली एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रही है, तो दूसरी ओर रूस, ईरान, मध्य एशिया और अन्य देशों के साथ भी अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए हुए है। पीएम मोदी की बिश्केक में हुई बैठकें इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।

ईरान और चाबहार क्यों है भारत के लिए अहम?

ईरान के साथ भारत के संबंधों में कनेक्टिविटी और रणनीतिक पहुंच का महत्व लगातार बढ़ा है। ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की संभावनाएं मजबूत होती हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भी भारत का ईरान के साथ संवाद जारी रखना उसकी स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है। पीएम मोदी और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

आर्मीनिया के साथ रक्षा और कनेक्टिविटी पर नजर

आर्मीनिया भी भारत की रणनीतिक सोच में महत्वपूर्ण स्थान बना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच खासकर रक्षा सहयोग मजबूत हुआ है। भारत आर्मीनिया को रक्षा उपकरण उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। आर्मीनिया की भौगोलिक स्थिति भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण कॉकस में स्थित यह देश यूरोप, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के बीच एक अहम कनेक्टिविटी क्षेत्र बन सकता है। भारत और आर्मीनिया के बीच संबंधों को केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं माना जा रहा है। कनेक्टिविटी और व्यापार के लिहाज से भी दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

चाबहार से यूरोप तक नया कनेक्टिविटी रूट?

भारत, ईरान और आर्मीनिया के बीच कनेक्टिविटी सहयोग की संभावनाएं पहले भी चर्चा में रही हैं। चाबहार बंदरगाह, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और आर्मीनिया की ‘क्रॉसरोड्स ऑफ पीस’ पहल को एक साथ जोड़कर देखा जाए तो भारत के लिए एक वैकल्पिक व्यापार और परिवहन मार्ग की संभावनाएं दिखाई देती हैं। संभावित कनेक्टिविटी नेटवर्क भारत से ईरान होते हुए दक्षिण कॉकस और आगे यूरोप तथा मध्य एशिया तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि इसे पूरी तरह विकसित करने के लिए कई देशों के बीच बुनियादी ढांचे और कूटनीतिक समन्वय की जरूरत होगी।

मध्य एशिया पर भारत का बढ़ता फोकस

पीएम मोदी की किर्गिस्तान यात्रा का एक बड़ा पहलू मध्य एशिया के साथ भारत के बढ़ते संबंध हैं। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों के साथ भारत ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। मध्य एशिया भारत के लिए रणनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों, व्यापार मार्गों और सुरक्षा के लिहाज से अहम है। अफगानिस्तान की स्थिति, आतंकवाद, कट्टरपंथ और क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के कारण भी मध्य एशिया का महत्व बढ़ गया है।

चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत की रणनीति

इस पूरे समीकरण में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए चीन मध्य एशिया से पाकिस्तान और मध्य पूर्व तक अपनी आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी मजबूत कर चुका है। भारत इसके जवाब में किसी एक परियोजना या गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय कनेक्टिविटी, रक्षा सहयोग, व्यापार और कूटनीति को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। चाबहार में सहयोग, आर्मीनिया के साथ रक्षा संबंध और मध्य एशिया के देशों के साथ रणनीतिक जुड़ाव को इसी व्यापक दृष्टिकोण के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है।

क्या भारत ‘मक्का गैंग’ के जवाब में बनाएगा नया गठबंधन?

फिलहाल भारत की ओर से सऊदी अरब-पाकिस्तान-तुर्किए समझौते के जवाब में किसी नए सैन्य गठबंधन की पहल के संकेत नहीं हैं। भारत की रणनीति पारंपरिक गठबंधन राजनीति से अलग दिखाई देती है। नई दिल्ली एक साथ कई देशों के साथ अपने हितों के मुताबिक साझेदारी कर रही है—अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा, ईरान के साथ कनेक्टिविटी, आर्मीनिया के साथ रक्षा सहयोग और मध्य एशिया के साथ रणनीतिक संबंध।

बिश्केक से भारत का बड़ा संदेश

पीएम मोदी की बिश्केक में ईरान, आर्मीनिया और किर्गिस्तान के नेताओं के साथ हुई मुलाकातों को एक साथ देखा जाए तो भारत की विदेश नीति की व्यापक दिशा समझ आती है। ईरान के साथ संवाद पश्चिम एशिया, आर्मीनिया के साथ संपर्क दक्षिण कॉकस और किर्गिस्तान के साथ संबंध मध्य एशिया में भारत की सक्रियता का संकेत देते हैं। ऐसे समय में जब क्षेत्रीय स्तर पर नए रणनीतिक समीकरण बन रहे हैं, भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने लिए वैकल्पिक कनेक्टिविटी रूट, रणनीतिक साझेदारी और कूटनीतिक विकल्प मजबूत करने पर जोर देता नजर आ रहा है।

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