Wednesday, July 1, 2026
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30 दिन की न्यायिक हिरासत वाला प्रावधान बरकरार रखने के पक्ष में संसदीय समिति, रिपोर्ट जल्द हो सकती है पेश

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में 30 दिन तक लगातार न्यायिक हिरासत में रहने की स्थिति में पद से हटाने से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, समिति इस विधेयक के सबसे चर्चित प्रावधान को बरकरार रखने के पक्ष में दिखाई दे रही है। हालांकि, इसके दुरुपयोग की आशंका को रोकने के लिए कुछ अतिरिक्त सुझाव और सुरक्षा उपाय भी रिपोर्ट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, किसी राज्य के मुख्यमंत्री या केंद्र एवं राज्य सरकार के किसी मंत्री को ऐसे मामले में गिरफ्तार किया जाता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, और वह लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे पद छोड़ना होगा। यदि निर्धारित समय तक आवश्यक कार्रवाई नहीं होती, तो संबंधित पद स्वतः रिक्त होने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। रिहाई के बाद दोबारा पद ग्रहण करने का अवसर उपलब्ध रहेगा।

समिति के समक्ष हुई चर्चाओं के दौरान इस प्रावधान को लेकर अलग-अलग राय सामने आई हैं। कुछ सदस्यों का मानना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह व्यवस्था आवश्यक है। वहीं, कुछ सदस्यों ने आशंका जताई है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या दुर्भावनापूर्ण मामलों में इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है। इसी कारण रिपोर्ट में ऐसे सुझाव शामिल किए जाने की संभावना है, जिनसे कानून का इस्तेमाल केवल वास्तविक और गंभीर परिस्थितियों में ही हो सके।

बताया जा रहा है कि समिति अपनी रिपोर्ट संसद के आगामी सत्र में पेश कर सकती है। रिपोर्ट को मंजूरी मिलने के बाद विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा होगी। चूंकि यह संवैधानिक संशोधन का मामला है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाता है। दूसरी ओर, संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नए प्रावधान के साथ पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और संतुलन सुनिश्चित करना आवश्यक होगा, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित न हो। ऐसे में अब सभी की निगाहें जेपीसी की अंतिम रिपोर्ट और संसद में होने वाली बहस पर टिकी हैं।

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