US Israel Iran War: शांति सब चाहते हैं तो पहल में देरी क्यों ?

    जब अधिकांश देश चाहते हैं कि युद्ध बंद हो और शांति बहाल हो तो पहल क्यों नहीं करते। मानवता की जीत के लिए शांति का रास्ता खोला जाए, इसके लिए पहल की जिम्मेदारी भी सभी देशों को लेनी होगी। ट्रंप हो या खमेनेई या फिर नेतन्याहू, इनको भी सोचना चाहिए कि मामूली हठ के चलते इंसानियत का कत्ल करना बहादुरी नहीं।

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    US Israel Iran War: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध को तकरीबन एक महीना होने जा रहा है। हजारों जिंदगी चली गईं तो अरबो-खरबों का नुकसान हुआ। इन तीन देशों के बीच चल रहे युद्ध ने दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित भी किया। कहीं गैस की किल्लत तो कहीं क्रूड ऑयल की। चीन-श्रीलंका जैसे देशों को जहां बिना किसी शुल्क के होर्मुज से गुजरने की अनुमति दे दी गई वहीं भारत समेत कई देशों को इसके लिए अच्छी खासी मुसीबत झेलनी पड़ी। सुनने में तो यह भी आया कि इसके बदले अच्छा खासा ‘टोल टैक्स’ भी देना पड़ा। ईरान ने अमेरिका-इजरायल के साथ सहयोग करने वाले देशों को यहां से गुजरने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी जबकि अन्य देशों को जो छूट भी दी है वो अपने हिसाब से। युद्ध थम नहीं रहा, बातचीत चल रही है। दुनिया के दो दर्जन से अधिक देश जहां होर्मुज का रास्ता साफ करने की मांग कर रहे हैं वहीं इससे दोगुने देश युद्ध को पूरी तरह बंद करवाना चाहते हैं। अमेरिका-दक्षिण अफ्रीका समेत कई देशों में तो पब्लिक इसके लिए प्रदर्शन तक कर रही है। वहीं सऊदी अरब समेत कुछ देश अमेरिका को ईरान पर हमले जारी रखने की बात कह रहे हैं।

    ईरान मान नहीं रहा, बातचीत की सूरत बन नहीं रही तो युद्ध कैसे रुके? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी युद्ध को लेकर कोई साफ-सुथरी राय सामने नहीं आ रही। कभी वे युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत का आमंत्रण देते हैं तो कुछ ही देर बाद वे हमले जारी रखने का ऐलान कर देते हैं। इजरायल अमेरिका की तरफ बोल रहा है तो ईरान के पक्ष में चीन-रूस के अलावा कई और देश। बावजूद इसके युद्ध को बंद करने के लिए समझौता वार्ता की पहल कहीं से होती नहीं दिख रही। अब पाकिस्तान खुद को सीज फायर करवाने की कोशिश में जुटा बता रहा है। चंद दिनों में पूरी दुनिया ने एक बार फिर जान लिया कि युद्ध का कोई फायदा नहीं होता। आम नागरिक को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कुछ दिनों का हाल सबने देख ही लिया, सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी कतारें और रोती हुई महिलाएं।

    झुक कोई नहीं रहा, शांति वार्ता के लिए तैयार भी कोई कैसे हो जब भड़काने वाले मौजूद हों। युद्ध समाप्त करने के लिए दोनों पक्षों की शर्तें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। अमेरिका तत्काल युद्धविराम चाहता है। जबकि ईरान पहले प्रतिबंधों में राहत और सुरक्षा गारंटी मांग रहा है। ईरान मुआवजा भी चाहता है। इज़राइल सुरक्षा को लेकर सख्त रुख लिए हुए है तो खाड़ी देशों की भूमिका भी स्थिति को संवेदनशील बना रही है। हालांकि कई देश बातचीत की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कोई मजबूत मध्यस्थ सामने नहीं आया जो दोनों पक्षों को भरोसा दिला सके। संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक चिंता बन चुका है। ऊर्जा संकट, महंगाई और अस्थिरता का खतरा बढ़ रहा है।

    सबसे पहला कदम बिना शर्त युद्धविराम होना चाहिए। जब तक हमले जारी रहेंगे, बातचीत का माहौल बनना मुश्किल है। युद्धविराम से मानवीय राहत भी संभव होगी और भरोसा कायम होगा। इतिहास गवाह है कि हर युद्ध का अंत बातचीत से ही हुआ। चाहे संघर्ष कितना भी गहरा हो, अंततः संवाद ही समाधान देता है। संयुक्त राष्ट्र समेत वैश्विक संस्थाओं को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट होता है, तब शांति की संभावना बढ़ती है। बातचीत नहीं होने का सबसे बड़ा कारण रहा कि जो भी अमेरिका या ईरान का मित्र देश है, उसने इसके लिए पहल ही नहीं की। यही नहीं कुछ देश तो डर के मारे ही नहीं बोल रहे कि कहीं अमेरिका या ईरान, बुरा न मान जाए। जब अधिकांश देश चाहते हैं कि युद्ध बंद हो और शांति बहाल हो तो पहल क्यों नहीं करते। मानवता की जीत के लिए शांति का रास्ता खोला जाए, इसके लिए पहल की जिम्मेदारी भी सभी देशों को लेनी होगी। ट्रंप हो या खमेनेई या फिर नेतन्याहू, इनको भी सोचना चाहिए कि मामूली हठ के चलते इंसानियत का कत्ल करना बहादुरी नहीं।

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