दर्शन के लिए ‘घूस’ तो इंतजाम में ढिलाई की दोषी केवल पुलिस कैसे !

    Stampede: नालंदा भगदड़ ने एक बार फिर व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर की हैं। भीड़ प्रबंधन, पुलिस तैनाती और प्रशासनिक तैयारी की कमी साफ दिखी, लेकिन जिम्मेदारी केवल पुलिस पर डालना उचित नहीं। पैसे लेकर वीआईपी दर्शन और असमान व्यवस्था ने हालात बिगाड़े। आस्था स्थलों पर पारदर्शी, समान और सख्त व्यवस्था जरूरी है, वरना ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।

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    Stampede: फिर भगदड़ और श्रद्धालुओं की मौत। इस बार बिहार के नालंदा के मघड़ा शीतला माता मंदिर में यह दर्दनाक हादसा हुआ। आठ महिलाओं समेत 9 श्रद्धालुओं की मौत हो गई जबकि डेढ़ दर्जन से अधिक घायल हुए। पांच घायलों की हालत गंभीर बनी हुई है। अब इस भगदड़ के कारण तलाशे जा रहे हैं, मृतकों और घायलों को मुआवजा राशि देने का ऐलान हो ही चुका है। करीब सवा साल में देशभर में भगदड़ की आठ अलग-अलग घटनाओं में करीब 150 लोगों की मौत हो चुकी है। इनके कारण भी गिनाए गए, बावजूद इसके कारण पैदा करने का दोषी उनको ही बता दिया गया, जिनकी मौत हो गई थी या वो चोटिल हुए। बदइंतजामी की जिम्मेदार न कोई सरकार बनी न मंत्री, छोटे-मोटे अफसरों के निलंबन कर मामले को शांत कर दिया गया। यहां भी ऐसा ही हुआ, पहले थाना प्रभारी को सस्पेंड कर दिया और फिर बाद में तीन अन्य पुलिसकर्मियों को। सबसे दु:ख की बात यह सामने आई कि पुरोहित पैसे लेकर लोगों को गर्भगृह में ले जा रहे थे। हजारों की संख्या में श्रद्धालु तो थे पर उन्हें व्यवस्थित करने के लिए पुलिस जवान ही नहीं थे। पता चला कि वे सभी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के एक समारोह के लिए लगा दिए गए। अब जिम्मेदार यह कहने में लगे हैं कि पंडा कमेटी ने व्यवस्था के लिए पुलिस की डिमांड ही नहीं की।

    नालंदा में हुई भगदड़ एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा करती है, हम हर हादसे के बाद सीख क्यों नहीं लेते? हर बार कहीं न कहीं भीड़ नियंत्रण की कमी, अव्यवस्था और लापरवाही के कारण जानें जाती हैं, फिर भी व्यवस्था में ठोस सुधार दिखाई नहीं देता। अब यहां आयोजन में कितने लोग आएंगे, इसका सही अनुमान नहीं लगाया गया। क्षमता से ज्यादा भीड़ इकट्ठा होते ही दबाव बढ़ा और हालात बिगड़ गए। बैरिकेडिंग, पुलिस बल और वालंटियर की कमी के कारण भीड़ को नियंत्रित नहीं किया जा सका। पहला सवाल पुलिस बल की तैनाती को लेकर उठता है। यदि वहां पुलिस और होमगार्ड मौजूद होते, तो भीड़ को नियंत्रित कर अलग-अलग दिशाओं में मोड़ा जा सकता था। इनके न होने के कारण भीड़ पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका। भगदड़ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भीड़ प्रबंधन की छोटी-सी चूक भी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। यह भी सामने आया कि पुरोहित पैसे लेकर दर्शन करा रहे थे, जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आस्था के नाम पर अगर प्राथमिकता पैसे से तय होने लगे, तो भीड़ और अव्यवस्था बढ़ना तय है। बताया जा रहा है कि कुछ लोग पैसे देकर जल्दी दर्शन के लिए आगे बढ़ाए जा रहे थे, जबकि सामान्य श्रद्धालुओं को रोका जा रहा था। इससे कतारों में असंतोष बढ़ा, धक्का-मुक्की हुई और भीड़ का संतुलन बिगड़ गया।

    जब एक तरफ से अचानक लोगों को अंदर भेजा जाता है और दूसरी तरफ रोका जाता है, तो दबाव पैदा होता है-यही दबाव कई बार भगदड़ का कारण बन जाता है। यह स्थिति केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता भी है। यदि प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कतार प्रणाली लागू की होती और किसी को भी पैसे लेकर प्राथमिकता देने पर रोक लगाई होती, तो हालात काबू में रह सकते थे। आस्था स्थल पर पारदर्शी और समान व्यवस्था जरूरी होती है, वरना असमानता गुस्से और अफरातफरी को जन्म देती है। दुर्भाग्य यह है कि कई धार्मिक स्थलों पर वीआईपी दर्शन और विशेष व्यवस्था के नाम पर अलग-अलग कतारें बना दी जाती हैं। जब यह प्रक्रिया अनौपचारिक रूप से पैसे लेकर होने लगे, तो भीड़ का संतुलन टूटना स्वाभाविक है। यह न केवल आस्था का अपमान है, बल्कि सुरक्षा के लिए भी खतरा है। जरूरत है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो। पैसे लेकर दर्शन कराने वालों की जिम्मेदारी तय की जाए और भविष्य में स्पष्ट नियम बनाए जाएं-एक कतार, एक व्यवस्था, सबके लिए समान अवसर। आस्था का स्थान व्यवस्था और अनुशासन से चलता है, सौदेबाजी से नहीं। यदि इस पर रोक नहीं लगी, तो ऐसी घटनाएं फिर दोहराई जाएंगी और हर बार सवाल उठेगा-क्या आस्था भी अब पैसों की मोहताज हो गई है? हर जगह का यही हाल है, बड़े तीर्थ स्थल से लेकर मंदिरों में दर्शन के लिए या तो किसी से कहलवाओ वरना दर्शन के लिए टैक्स चुकाओ। आखिर भगवान के दर्शन के लिए वसूली क्या किसी भी धर्म में मान्य है? जिनके हवाले मंदिर हैं वे ही भगवान के नाम पर वसूली करें तो समझ में आ जाता है कि पाप क्या और पुण्य क्या?

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