न्यू सांगानेर रोड पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर लोगों में आक्रोश है। उनके सपने ढहाए जाएंगे, अनेक दुकानदारों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हाेगा। विरोध भी अपनी जगह वाजिब है, हाईकोर्ट के आदेश की दुहाई देने वाले अफसर क्या बता पाएंगे कि ऐसा होने क्यों दिया गया। मास्टर प्लान की बात करें या फिर अतिक्रमण हटाने की यह जाग…अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही क्यों होती है। अतिक्रमण हमारी अनिवार्यता बन चुकी है। इसे फलने-फूलने का ठेका भी उन अफसरों ने उठा रखा है जिन्हें इसे हटाने की जिम्मेदारी दी गई है। यहां भी यही हुआ, सड़क किनारे धीरे-धीरे कब्जे होते रहे, निर्माण होते रहे, व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती रहीं और जिम्मेदार विभागों की निगरानी आखिर कहां थी? क्या प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं दिया? या फिर कार्रवाई तब तक टलती रही, जब तक मामला अदालत तक नहीं पहुंच गया? अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद अतिक्रमण हटाया जा रहा है तो स्वाभाविक रूप से उन लोगों के सामने रोजी-रोटी और वर्षों से बने आशियाने का संकट खड़ा है। उनकी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी अवैध निर्माण को लंबे समय तक बने रहने देने से वह वैध नहीं हो जाता।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब ऐसी कार्रवाई के बाद राजनीतिक दल और नेता जनता के आक्रोश के बीच सक्रिय हो जाते हैं। सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनीति का केंद्र केवल कार्रवाई रुकवाना नहीं होना चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि जिस व्यवस्था ने अतिक्रमण को जन्म लेने और बढ़ने दिया, उस पर जवाबदेही कब तय होगी? आज अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर पहुंच गया, लेकिन कल जब अतिक्रमण शुरू हुआ था तब निरीक्षण करने वाले अधिकारी, स्थानीय निकाय के कर्मचारी और संबंधित विभाग क्या कर रहे थे? यदि नियमों का उल्लंघन हुआ था तो समय रहते नोटिस क्यों नहीं दिए गए? निर्माण रोकने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई हुई तो उसे प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं किया गया? यह केवल न्यू सांगानेर रोड का सवाल नहीं है।
जयपुर में अनेक सड़कों, नालों, सरकारी जमीनों और सार्वजनिक रास्तों पर पहले अतिक्रमण होता है, फिर वह धीरे-धीरे स्थायी रूप ले लेता है और अंततः उसे हटाना प्रशासन के लिए भी मुश्किल तथा जनता के लिए भी पीड़ादायक हो जाता है। सरकार और प्रशासन को अब केवल अतिक्रमण हटाने की सफलता नहीं गिनानी चाहिए, बल्कि यह भी बताना चाहिए कि अतिक्रमण हुआ कैसे और किसकी निगरानी में हुआ। जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी क्षेत्र की निगरानी की थी, उनके रिकॉर्ड की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? आखिर हर बार जिम्मेदारी जनता की ही क्यों बने—पहले अतिक्रमण का बोझ जनता सहे और बाद में हटाने का भी? हाईकोर्ट का आदेश कानून के पालन का विषय है।
राजनीति उससे ऊपर नहीं हो सकती। लेकिन प्रशासन भी इस सवाल से बच नहीं सकता कि अगर समय रहते कार्रवाई कर दी जाती तो आज यह विवाद, आक्रोश और विस्थापन की स्थिति पैदा ही क्यों होती? अतिक्रमण हटाना जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है अतिक्रमण को पनपने से रोकना। वरना आज न्यू सांगानेर रोड होगा, कल कोई दूसरी सड़क और उसके बाद कोई तीसरा इलाका। कार्रवाई चलती रहेगी, राजनीति होती रहेगी और जिम्मेदार अधिकारी हर बार बच निकलेंगे। यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि जब कोई निर्माण शुरू होता है तो उसे रोकने के लिए निरीक्षण व्यवस्था क्यों काम नहीं करती? जब सड़क किनारे कब्जा बढ़ता है तो संबंधित अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं करते? क्या हर अवैध निर्माण के खिलाफ हाईकोर्ट का आदेश जरूरी है?
व्यवस्था की इसी कमजोरी से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। यदि अतिक्रमण शुरू होते ही कार्रवाई हो जाए तो किसी को लाखों रुपये लगाकर स्थायी निर्माण करने का अवसर ही नहीं मिलेगा। लेकिन जब वर्षों तक सब चलता रहे और अचानक कार्रवाई हो, तो विवाद भी पैदा होगा, राजनीतिक हस्तक्षेप भी होगा और सबसे ज्यादा परेशान वही आम आदमी होगा जिसने व्यवस्था पर भरोसा करके अपनी जिंदगी की जमा पूंजी लगा दी। जनता के दुख को कौन समझेगा…उन अफसरों से भी सफाई मांगी जाए जो इसके लिए जिम्मेदार थे।



