नई दिल्ली। देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार इस वर्ष उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है। जून के अधिकांश दिनों में मध्य भारत के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई, जिसके कारण तापमान में बढ़ोतरी और गर्म हवाओं का असर देखने को मिल रहा है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की कमी और मानसून की धीमी प्रगति ने कई राज्यों में चिंता बढ़ा दी है।
विशेष रूप से मध्य भारत के क्षेत्रों में वर्षा का बड़ा अभाव दर्ज किया गया है। खेतों में नमी की कमी के कारण खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। कई स्थानों पर दिन का तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर पहुंच गया है, जिससे लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि देश के सबसे अधिक वर्षा वाले इलाकों में गिने जाने वाले मेघालय के मावसिनराम और सोहरा जैसे क्षेत्रों में भी इस बार बारिश का प्रदर्शन अपेक्षा से कमजोर रहा है।
आमतौर पर जून में भारी वर्षा के लिए प्रसिद्ध ये इलाके इस बार सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच सके हैं। मौसम वैज्ञानिक इसे मानसूनी प्रणाली की कमजोर सक्रियता और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आए बदलावों से जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भारी बारिश की गतिविधियां जारी हैं, लेकिन इसका लाभ देश के मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल मौसमी तंत्रों का मजबूत होना आवश्यक है।
मौसम विभाग ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में मानसून की गतिविधियों में सुधार हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों को राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि फिलहाल किसानों और आम लोगों की नजरें आसमान पर टिकी हुई हैं। बारिश में जारी देरी न केवल कृषि बल्कि जल भंडारण, बिजली उत्पादन और दैनिक जीवन पर भी असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते जलवायु पैटर्न के बीच मानसून की अनिश्चितता भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकती है, इसलिए मौसम संबंधी पूर्वानुमानों और जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
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