गुवाहाटी: असम में नागरिकता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति को विदेशी घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि केवल कई दस्तावेज़ प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट रूप से साबित होना चाहिए कि उन दस्तावेज़ों का संबंध उसी व्यक्ति और उसके पारिवारिक वंशक्रम से है।
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में कुल 15 दस्तावेज़ पेश किए थे। इनमें पुराने मतदाता सूची के रिकॉर्ड, 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जुड़े दस्तावेज़, स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे रिकॉर्ड शामिल थे। उनका दावा था कि उनका परिवार लंबे समय से असम में रह रहा है और वे जन्म से भारतीय नागरिक हैं। हालांकि अदालत ने पाया कि दस्तावेज़ों में मौजूद कुछ विसंगतियों और पारिवारिक संबंधों को प्रमाणित करने वाले साक्ष्यों की कमी के कारण नागरिकता का दावा कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।
न्यायालय ने कहा कि अलग-अलग अभिलेखों में दर्ज नामों और पारिवारिक कड़ियों का स्पष्ट और विश्वसनीय मेल स्थापित करना आवश्यक है। केवल मौखिक बयान या पहचान संबंधी सामान्य दस्तावेज़ नागरिकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी दोहराया कि विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत किसी व्यक्ति पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह स्वयं पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से साबित करे कि वह भारतीय नागरिक है। यदि प्रस्तुत प्रमाण इस कानूनी मानक को पूरा नहीं करते, तो अदालत ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
यह मामला असम में नागरिकता संबंधी मामलों की संवेदनशीलता और दस्तावेज़ी साक्ष्यों के महत्व को एक बार फिर सामने लाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल पहचान संबंधी दस्तावेज़ होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि परिवार की पीढ़ीगत कड़ी और आधिकारिक रिकॉर्ड के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना भी आवश्यक है। अदालत के इस फैसले को भविष्य में इसी प्रकार के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है।



