नई दिल्ली (प्रज्ञा पांडे)। दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में एडमिशन प्रक्रिया को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। यूनिवर्सिटी से जुड़े दो ऑफ-कैंपस कॉलेजों ने कुछ स्नातक सीटों पर CUET के बजाय 12वीं बोर्ड के अंकों के आधार पर दाखिले की प्रक्रिया शुरू की है। इस फैसले के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा CUET (Common University Entrance Test) अपने उद्देश्य को पूरी तरह पूरा कर पा रही है या नहीं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज ने कुछ खाली सीटों को भरने के लिए 12वीं के अंकों के आधार पर प्रवेश देने का फैसला लिया है। यह फैसला सामने आने के बाद शिक्षा जगत में चर्चा तेज हो गई है। कई लोगों का सवाल है कि जब DU में दाखिले के लिए CUET अनिवार्य है, तो फिर बोर्ड अंकों के आधार पर प्रवेश क्यों दिया जा रहा है? CUET को देशभर के छात्रों को एक समान अवसर देने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इससे पहले अलग-अलग बोर्डों के मूल्यांकन पैटर्न में अंतर के कारण छात्रों के अंकों की तुलना को लेकर सवाल उठते थे। CUET के जरिए सभी छात्रों को एक समान परीक्षा के माध्यम से दाखिले का मौका देने की कोशिश की गई थी।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का कहना है कि यह फैसला CUET को हटाने के लिए नहीं लिया गया है। कुछ ऑफ-कैंपस कॉलेजों में सीटें खाली रह जाने के कारण सीमित स्तर पर 12वीं के अंकों के आधार पर प्रवेश की अनुमति दी गई है। DU के मुताबिक, यह कदम सिर्फ खाली सीटों का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए उठाया गया है और मुख्य प्रवेश प्रक्रिया अभी भी CUET के माध्यम से ही जारी रहेगी। इस फैसले को लेकर शिक्षा विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। एक वर्ग का मानना है कि अगर CUET के बाद भी कॉलेजों को बोर्ड अंकों के आधार पर दाखिले देने पड़ रहे हैं, तो यह प्रवेश प्रणाली की चुनौतियों को दिखाता है। वहीं कुछ विशेषज्ञ इसे सिर्फ एक व्यावहारिक कदम मानते हैं, जिससे खाली सीटों को भरा जा सके और छात्रों को मौका मिल सके।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर देश की प्रवेश प्रणाली पर चर्चा शुरू कर दी है। भारत जैसे विविध शिक्षा तंत्र वाले देश में एक ही परीक्षा मॉडल कितना प्रभावी है, इस पर सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल DU ने साफ कर दिया है कि CUET की व्यवस्था खत्म नहीं हुई है। यह फैसला केवल कुछ कॉलेजों में खाली सीटों को भरने के लिए विशेष परिस्थिति में लिया गया है। अब देखने वाली बात होगी कि यह कदम सिर्फ एक अस्थायी व्यवस्था बनकर रह जाता है या आने वाले समय में उच्च शिक्षा की प्रवेश नीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत करता है।



