नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा कराने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से इन दोनों विषयों पर स्पष्ट नीति सामने रखने और संसद में विस्तृत बहस कराने की मांग की है। उनका कहना है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी से जुड़े इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द निर्णय लिया जाना चाहिए।
विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण को लेकर कानून बनने के बावजूद इसका लाभ अभी तक महिलाओं को नहीं मिल पाया है। उनका कहना है कि आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया परिसीमन और जनगणना से जुड़ी होने के कारण लगातार टलती जा रही है। ऐसे में सरकार को विशेष सत्र बुलाकर इस संबंध में सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए। विपक्षी नेताओं का कहना है कि महिलाओं को संसद और विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का वादा जल्द पूरा होना चाहिए। उनका मानना है कि यदि आवश्यक हो तो सरकार इस दिशा में नए विधायी कदम उठाए, ताकि आगामी चुनावों से पहले महिला आरक्षण को प्रभावी बनाया जा सके।
दूसरी ओर, परिसीमन का मुद्दा भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कई दलों का कहना है कि इस प्रक्रिया का सीधा असर राज्यों के प्रतिनिधित्व और लोकसभा सीटों के वितरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार को सभी राज्यों और राजनीतिक दलों की राय लेकर ही आगे बढ़ना चाहिए। विपक्ष ने मांग की है कि परिसीमन से जुड़े सभी प्रस्तावों पर संसद में खुली और विस्तृत चर्चा हो, ताकि किसी भी तरह की आशंका या भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही विषय देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। इन पर लिए जाने वाले फैसलों का प्रभाव आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
इसलिए व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक माना जा रहा है। सरकार की ओर से फिलहाल विशेष सत्र बुलाने को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि, राजनीतिक हलकों में इन मुद्दों पर लगातार चर्चा जारी है और माना जा रहा है कि सरकार उचित समय पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर जारी बहस ने एक बार फिर देश में चुनावी सुधार, समान प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इन मांगों पर क्या निर्णय लेती है और संसद में इस विषय पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।



