(प्रज्ञा पांडे)। सुबह उठते ही हमारी आंखें अक्सर किसी अपने चेहरे को नहीं, बल्कि फोन की स्क्रीन को देखती हैं। एक क्लिक में हम जान लेते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है। कौन घूमने गया, किसने नई नौकरी शुरू की, किसका रिश्ता कितना खूबसूरत है, कौन अपनी जिंदगी में कितना आगे बढ़ चुका है। हमारी स्क्रीन पर हजारों चेहरे हैं। हजारों फॉलोअर्स हैं। सैकड़ों कॉन्टैक्ट्स हैं। लेकिन कभी खुद से एक सवाल पूछिए, अगर आज रात आपका मन बहुत भारी हो जाए…अगर आपको किसी की जरूरत हो…तो क्या आपके पास कोई ऐसा इंसान है जिसे आप बिना सोचे फोन कर सकें? यही है आज की नई तन्हाई। एक ऐसी तन्हाई जिसमें इंसान अकेला बैठा नहीं होता, फिर भी अंदर से अकेला महसूस करता है। दुनिया से जुड़े हैं, लेकिन खुद से दूर हो रहे हैं। एक समय था जब दूर रहने वाला इंसान अकेला महसूस करता था। लेकिन आज दूरी बदल गई है। अब दूरी किलोमीटर की नहीं, भावनाओं की है। हम रोज कई लोगों से बात करते हैं, लेकिन कितनी बार हम किसी के साथ अपनी फीलिंग्स साझा करते हैं? हम “कैसे हो?” पूछते हैं, लेकिन कई बार जवाब सुनने के लिए रुकते नहीं। हम जानते हैं कि कौन कहां घूम रहा है, कौन क्या खा रहा है, किसकी जिंदगी में क्या नया हो रहा है। लेकिन कई बार हमें यह नहीं पता होता कि हमारे सबसे करीब इंसान अंदर से कैसा महसूस कर रहा है। हम लोगों की जिंदगी के अपडेट जानते हैं, लेकिन उनकी भावनाओं से अनजान रह जाते हैं।
सोशल मीडिया ने रिश्तों को बदला है। सोशल मीडिया हमारी जिंदगी में कई अच्छी चीजें भी लेकर आया हैं। इसने दूर बैठे परिवार और दोस्तों को जोड़े रखा। लोगों को अपनी आवाज उठाने का मौका दिया। नई कम्युनिटी बनाने में मदद की। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब ऑनलाइन जुड़ाव, असली जुड़ाव की जगह लेने लगता है। क्योंकि इंसान को सिर्फ बातचीत नहीं चाहिए। इंसान को चाहिए सुना जाना, समझा जाना, महत्वपूर्ण महसूस करना। एक लाइक यह बता सकता है कि लोगों ने आपकी फोटो देखी है। लेकिन यह नहीं बता सकता कि कोई आपके दर्द को समझता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी जरूरत है अपनापन। जब हम लंबे समय तक खुद को अकेला महसूस करते हैं, तो इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसलिए अकेलापन सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि दिमाग का संदेश है “मुझे किसी से सच में जुड़ना है।” आज हमारे पास फॉलोअर्स तो बहुत हैं, लेकिन फॉलोअर्स और दोस्त अलग होते हैं। फॉलोअर्स आपकी पोस्ट देखते हैं, जबकि दोस्त आपको समझते हैं और मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं। सोशल मीडिया के दौर में हम अक्सर यह सोचते हैं, “लोग मुझे कितना पसंद करते हैं?” जबकि असली सवाल होना चाहिए “क्या मैं खुद को पसंद करता हूँ?” जब ज़िंदगी जीने से ज़्यादा दिखाने की चीज़ बन जाती है, तो खालीपन बढ़ने लगता है। असली खुशी लाइक्स में नहीं, बल्कि उन रिश्तों और पलों में है जिन्हें कैमरा बंद होने के बाद भी जीने का मन करे।
क्या सोशल मीडिया समस्या है? नहीं। सोशल मीडिया दुश्मन नहीं है। समस्या यह है कि हमने कभी-कभी इसे कनेक्शन का माध्यम नहीं, अपनी वैल्यू मापने का तरीका बना लिया है। अगर आपकी खुशी लाइक्स पर निर्भर होने लगे…अगर आपका आत्मविश्वास कमेंट्स से तय होने लगे… अगर आपकी पहचान इस बात से बनने लगे कि लोग आपको कितना देखते हैं…तो शायद हमें रुककर सोचना चाहिए। क्योंकि हमारी कीमत स्क्रीन पर दिखने वाले नंबरों से कहीं ज्यादा है। असली कनेक्शन वापस कैसे लाएं? शायद समाधान ज्यादा लोगों से जुड़ना नहीं है। शायद समाधान कुछ लोगों से गहराई से जुड़ना है। कभी दोस्त के साथ बैठकर बिना फोन के बात करना। कभी परिवार के साथ समय बिताना। कभी किसी से सिर्फ इतना पूछना “तुम सच में कैसे हो?” और फिर उसके जवाब को ध्यान से सुनना। क्योंकि कई बार लोगों को सलाह नहीं चाहिए होती। उन्हें बस कोई चाहिए होता है जो कह सके “मैं यहां हूं।”
आज हमारी स्क्रीन पर पूरी दुनिया मौजूद है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि हमारे कितने फॉलोअर्स हैं। सवाल यह है जब जिंदगी मुश्किल होगी, तो हमारे पास कौन होगा? क्योंकि हजारों लोगों द्वारा देखा जाना और किसी एक इंसान द्वारा सच में समझा जाना…इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। शायद आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत ज्यादा कनेक्शन नहीं होगी। बल्कि ज्यादा इंसानी जुड़ाव होगा। क्योंकि आखिर में हर इंसान, चाहे उसके कितने भी फॉलोअर्स हों…दिल सिर्फ यही चाहता है कोई उसे देखे नहीं…कोई उसे बस समझे।



