नई दिल्ली। दुनिया का नक्शा देखते हुए शायद आपने कभी गौर नहीं किया होगा कि अफ्रीका और ग्रीनलैंड के आकार में जमीन-आसमान का अंतर है। लेकिन सामान्य World Map में दोनों कई बार लगभग एक जैसे आकार के दिखाई देते हैं। इसकी वजह यह नहीं है कि अफ्रीका छोटा है, बल्कि नक्शा बनाने के तरीके में छिपी है। अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 30.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर है, जबकि ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 2.17 मिलियन वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है। फिर भी Mercator Projection में ग्रीनलैंड अपने वास्तविक आकार की तुलना में बहुत बड़ा दिखाई देता है। इतना ही नहीं, अफ्रीका इतना विशाल है कि उसके क्षेत्रफल की तुलना कई बड़े देशों और यूरोप के बड़े हिस्से को जोड़कर की जा सकती है। इसी वजह से नक्शे में देशों और महाद्वीपों के आकार को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।
1569 में बना था Mercator Map
इस कहानी की शुरुआत करीब 450 साल पहले हुई थी। साल 1569 में फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने Mercator Projection तैयार किया था। इसका उद्देश्य दुनिया के देशों को राजनीतिक या आर्थिक रूप से बड़ा दिखाना नहीं था। इसका मुख्य मकसद समुद्री यात्राओं और नेविगेशन को आसान बनाना था। इस Projection में दिशाओं और कोणों को इस तरह संरक्षित किया गया कि समुद्री यात्रियों के लिए रास्तों की योजना बनाना आसान हो सके। समय के साथ Mercator Projection की लोकप्रियता बढ़ती गई और यह एटलस, स्कूलों की किताबों तथा दीवारों पर लगे World Maps का हिस्सा बन गया।
धरती गोल और नक्शा सपाट, यहीं से शुरू होती है समस्या
धरती गोल है, लेकिन उसे कागज या स्क्रीन पर दिखाने के लिए सपाट नक्शे का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसी प्रक्रिया में अलग-अलग प्रकार के Map Projections बनाए जाते हैं। Mercator Projection में जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, क्षेत्रफल का आकार नक्शे पर अधिक बड़ा दिखाई देने लगता है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण ग्रीनलैंड है। वास्तविक क्षेत्रफल में अफ्रीका से बहुत छोटा होने के बावजूद Mercator Map में ग्रीनलैंड काफी बड़ा दिखाई देता है। इसके उलट भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका अपने वास्तविक आकार की तुलना में छोटा नजर आता है।
क्या यह सिर्फ नक्शे की तकनीकी समस्या है?
Mercator Projection के आलोचक इसे केवल तकनीकी समस्या नहीं मानते। उनका कहना है कि जिस नक्शे को बच्चे वर्षों तक स्कूलों में देखते हैं, वह दुनिया के आकार और देशों की स्थिति को लेकर उनकी मानसिक तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। आलोचकों के मुताबिक, यूरोप और उत्तरी गोलार्ध के कई हिस्से नक्शे पर वास्तविक क्षेत्रफल से बड़े दिखाई देते हैं, जबकि अफ्रीका और भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं। इसी वजह से कुछ अफ्रीकी देशों और संगठनों ने इसे औपनिवेशिक दौर की मानसिकता से जोड़ते हुए अधिक क्षेत्रफल-सटीक नक्शों के इस्तेमाल की मांग की है।
Equal Earth Projection क्यों चर्चा में है?
इसी बहस के बीच Equal Earth Projection को एक विकल्प के तौर पर सामने रखा गया। इसे 2018 में कार्टोग्राफर Bojan Šavrič, Tom Patterson और Bernhard Jenny ने विकसित किया था। Equal Earth एक equal-area projection है, यानी इसमें अलग-अलग देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को एक-दूसरे के अनुपात में ज्यादा सही तरीके से दिखाने की कोशिश की जाती है। इसमें अफ्रीका अपनी विशालता के करीब दिखाई देता है, जबकि ग्रीनलैंड और उत्तरी क्षेत्रों का आकार Mercator Map की तुलना में काफी कम नजर आता है।
UN में हुआ बड़ा मतदान
नक्शों को लेकर चल रही इस बहस ने सितंबर 2026 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा। 4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे से जुड़ा प्रस्ताव मतदान के लिए आया। दिए गए विवरण के अनुसार प्रस्ताव के समर्थन में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया। एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। प्रस्ताव टोगो की ओर से पेश किया गया था। टोगो ने अपने स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों को बदलने की दिशा में भी कदम उठाने की बात कही है।
क्या UN ने Mercator Map पर प्रतिबंध लगा दिया?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं है कि Mercator Map पर दुनिया भर में प्रतिबंध लग गया है या अब हर स्कूल, वेबसाइट और कंपनी को तुरंत अपना नक्शा बदलना होगा। इस पहल का उद्देश्य खासतौर पर उन परिस्थितियों में Equal Earth जैसे equal-area projections के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जहां महाद्वीपों और देशों के क्षेत्रफल की तुलना महत्वपूर्ण होती है। दूसरी ओर, समुद्री नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में Mercator Projection की उपयोगिता बनी रह सकती है, क्योंकि इसे मूल रूप से दिशाओं और कोणों से जुड़े नेविगेशनल इस्तेमाल के लिए विकसित किया गया था।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत ने इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है। हालांकि इस प्रस्ताव से भारत के वास्तविक क्षेत्रफल, सीमाओं या भौगोलिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा। दरअसल, यह पूरा मुद्दा मैप Projection का है। यानी पृथ्वी की गोल सतह को सपाट नक्शे पर किस तरह दिखाया जाए। इसलिए अगर आने वाले समय में स्कूलों, संस्थानों या मीडिया में Equal Earth जैसे Projection का इस्तेमाल बढ़ता है, तो लोगों को अफ्रीका और दुनिया के दूसरे क्षेत्रों का क्षेत्रफल वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई देगा। करीब 450 साल पुराने Mercator Projection ने दुनिया को नक्शे पर देखने का एक बेहद प्रभावशाली तरीका दिया। इसकी सबसे बड़ी ताकत नेविगेशन में थी, लेकिन क्षेत्रफल की तुलना के मामले में इसकी सीमाएं भी हैं। अब Equal Earth जैसे नए Projections और संयुक्त राष्ट्र में हुई चर्चा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया का नक्शा सिर्फ भौगोलिक जानकारी देने वाला उपकरण है या वह हमारी दुनिया को देखने की सोच को भी प्रभावित करता है?



