जयपुर। राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा के साथ उदयपुर नगर निगम की राजनीति गरमा गई है। 80 वार्डों वाले उदयपुर नगर निगम में बीजेपी पिछले छह कार्यकाल से अपना बोर्ड बनाती आ रही है। अब कांग्रेस के सामने बीजेपी के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगाने की चुनौती है। आरक्षण लॉटरी के बाद कई नेताओं के चुनावी समीकरण बदल गए हैं। महापौर का पद अनारक्षित होने से दोनों प्रमुख दलों में मेयर पद के दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ गई है। बीजेपी में कई चेहरे महापौर की दौड़ में हैं, वहीं कांग्रेस भी बीजेपी के विजय क्रम को रोकने की रणनीति पर काम कर रही है।
6 बार से BJP का बोर्ड
उदयपुर नगर निगम लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है। पिछले छह बोर्ड में बीजेपी की ओर से किरण माहेश्वरी, युधिष्ठिर कुमावत, रवींद्र श्रीमाली, रजनी डांगी, चंद्र सिंह कोठारी और गोविंद सिंह टांक नगर निगम के मुखिया रह चुके हैं। बीजेपी के जिला अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ का दावा है कि पार्टी इस बार भी जीत हासिल कर सातवां बोर्ड बनाएगी। वहीं कांग्रेस का फोकस शहर में विकास कार्यों को लेकर कथित नाराजगी और स्थानीय मुद्दों पर है। पार्टी बीजेपी के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है।
80 वार्डों में टिकट के लिए घमासान
चुनाव की घोषणा के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों में टिकट के दावेदार सक्रिय हो गए हैं। संभावित उम्मीदवार अपने-अपने स्तर पर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बार उदयपुर नगर निगम के महापौर का पद अनारक्षित है। इसके कारण मेयर की दौड़ में शामिल नेताओं ने भी अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। बीजेपी में महापौर पद के कई दावेदार होने से टिकट वितरण के दौरान अंदरूनी खींचतान की संभावना भी जताई जा रही है।
BJP में ये चेहरे मेयर की रेस में
बीजेपी में पारस सिंघवी, रवींद्र श्रीमाली, प्रमोद सामर और अतुल चंडालिया जैसे नेताओं के नाम प्रमुख दावेदारों में सामने आ रहे हैं। आरक्षण लॉटरी ने कुछ दावेदारों के लिए चुनावी राह आसान की है। पारस सिंघवी से जुड़े वार्ड 24 और 29 अनारक्षित ओपन हैं। रवींद्र श्रीमाली का वार्ड 33 और अतुल चंडालिया का वार्ड 78 भी अनारक्षित ओपन है। प्रमोद सामर का वार्ड भी ओपन है, लेकिन उन्हें निकाय चुनाव का संगठन प्रभारी बनाए जाने के कारण उनके चुनाव लड़ने को लेकर पार्टी के फैसले का इंतजार है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दावेदारों में से कितने नेताओं को बीजेपी का टिकट मिलता है।
कांग्रेस के दिग्गजों के भी बदले समीकरण
आरक्षण लॉटरी का असर कांग्रेस के नेताओं पर भी पड़ा है। शहर कांग्रेस अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ जिस वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वह अब अनारक्षित महिला हो गया है। पूर्व शहर कांग्रेस अध्यक्ष गोपाल शर्मा के वार्ड 6 को OBC ओपन आरक्षित किया गया है। उनकी बहू हिंताशी शर्मा के वार्ड 73 से दावेदारी करने की संभावना है, जो अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हुआ है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष मोहसिन खान और कांग्रेस नेता दिनेश श्रीमाली के वार्ड भी महिला आरक्षित हो गए हैं। ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने के लिए नए वार्ड की तलाश करनी पड़ सकती है। वहीं अरुण टांक के लिए वार्ड 3 का अनारक्षित ओपन होना उनकी दावेदारी को मजबूत कर सकता है।
बीजेपी में मंडल अध्यक्षों की दावेदारी से बढ़ी चुनौती
उदयपुर शहर बीजेपी के 12 मंडलों में से करीब आठ मंडल अध्यक्ष खुद या अपने परिवार के सदस्यों के लिए चुनावी दावेदारी की तैयारी में बताए जा रहे हैं। कन्हैया वैष्णव, महेश पुरी गोस्वामी, रणजीत दिग्पाल, अमृत मेनारिया, रुचिका चौधरी, विजय आहूजा और प्रताप सिंह समेत कई नाम चर्चा में हैं। कुछ मंडल अध्यक्ष पंचायती राज चुनावों पर फोकस कर रहे हैं। लेकिन जिन संगठन पदाधिकारियों की खुद चुनाव लड़ने की इच्छा है, उनके सामने एक व्यक्ति-एक पद की पार्टी नीति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
टिकट बंटवारे में दोनों दलों के सामने बड़ी चुनौती
उदयपुर में टिकट वितरण दोनों पार्टियों के लिए आसान नहीं होगा। बड़ी संख्या में दावेदार होने के कारण टिकट नहीं मिलने पर नाराजगी, गुटबाजी और बगावत का खतरा रहेगा। बीजेपी के सामने जहां अपने छह बार के बोर्ड के रिकॉर्ड को कायम रखने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के लिए स्थानीय मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाकर बीजेपी के मजबूत संगठन को चुनौती देना आसान नहीं होगा।
आरक्षण लॉटरी ने बदला पूरा चुनावी गणित
वार्डों के आरक्षण में बदलाव से कई पुराने दावेदारों की राजनीतिक जमीन बदल गई है। कुछ नेताओं के लिए उनके मौजूदा वार्ड में चुनाव लड़ने का रास्ता बंद हो गया, जबकि कई नए दावेदारों को मौका मिल गया है। इसका सीधा असर महापौर और उपमहापौर पद की दावेदारी पर भी पड़ सकता है। जिन नेताओं के वार्ड अनुकूल हुए हैं, उनकी सक्रियता बढ़ गई है।
BJP का गढ़ बचाना या कांग्रेस की सेंधमारी?
उदयपुर नगर निगम चुनाव में मुकाबला सिर्फ पार्षद की सीटों तक सीमित नहीं रहने वाला। महापौर पद और बोर्ड बनाने की लड़ाई दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी है। बीजेपी लगातार छह बोर्ड बनाने के बाद सातवीं बार सत्ता बरकरार रखने का दावा कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस स्थानीय विकास, नाराजगी और वार्ड स्तर के मुद्दों को लेकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश करेगी। अब असली परीक्षा टिकट वितरण के बाद शुरू होगी। कौन सा दल बागियों और गुटबाजी को बेहतर तरीके से संभालता है और कौन स्थानीय मतदाताओं का भरोसा जीतता है, यही उदयपुर नगर निगम की सत्ता का रास्ता तय करेगा।



