प्रतीक चौवे, संपादक
Road Accident In Rajasthan: सड़क हादसे बढ़ते जा रहे हैं। हफ्तेभर में हुए सड़क हादसों में तीन दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। जयपुर के खरबास सर्किल के पास हादसा सामने आया, जहां तेज रफ्तार कार ने बाइक को टक्कर मार दी। इस हिट-एंड-रन में एक व्यक्ति की मौके पर मौत हो गई और दो लोग गंभीर घायल हो गए। मुरलीपुरा इलाके में एसयूवी डिवाइडर से टकराई और लोहे की रेलिंग चालक के सीने में घुस गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। झालावाड़ में तो लापरवाही की हद दिखी—एक ही बाइक पर सवार 4 युवकों की बोलेरो से टक्कर में मौत हो गई। नागौर में बस और मिनी ट्रक की आमने-सामने भिड़ंत में 28 यात्री घायल हो गए, जहां प्राथमिक कारण तेज रफ्तार बताया गया। ये तो कुछ उदाहरण हैं, प्रदेशभर में सड़क दुर्घटनाओं का हाल यही है। सड़कों पर वाहनों की तेज रफ्तार इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है। चालान हो या अभियान, कोई खास असर नहीं हो पा रहा। नियम-कायदे लागू करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही, बावजूद इसके लोग ठीक ढंग से इन्हें मानने को ही तैयार नहीं। राजधानी जयपुर में ही अब बहुत से चौराहों पर सिग्नल लाइट लगा दी गई है पर कोई इनको मानने को तैयार नहीं।
ताजा सरकारी व सड़क सुरक्षा पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में हाल के वर्षों में औसतन 10 हजार से ज्यादा लोगों की हर साल सड़क हादसों में मौत हो रही है। राजस्थान में हर साल लगभग 11–12 हजार मौतें और 22–24 हजार लोग घायल हो रहे हैं। करीब 73 फीसदी हादसों का मुख्य कारण तेज स्पीड माना गया है। सड़क दुर्घटनाएं अब सामान्य खबर बनती जा रही हैं। हर दिन किसी न किसी परिवार का चिराग बुझ रहा है, लेकिन इसके बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता। विडंबना यह है कि सड़क हादसों के कारण लगभग तय हैं, समाधान भी पता है। इसके बाद भी लोग अपने स्तर पर ही लापरवाही बरत रहे हैं। तेज चलाना अब जोखिम नहीं, बल्कि सामान्य मान लिया गया है। इसके साथ ही शराब पीकर वाहन चलाना, मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग और नाबालिगों द्वारा वाहन चलाना स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। जब नियमों की खुलेआम अनदेखी हो और दंड का भय कमजोर हो, तो हादसे बढ़ना स्वाभाविक है।
इसके अलावा सड़कों की खामियां भी कई बार हादसों की वजह बन रही हैं। कई स्थानों पर ब्लैक स्पॉट वर्षों से चिन्हित हैं, लेकिन सुधार की गति धीमी है। अवैज्ञानिक कट, टूटी सड़कें, धुंधले संकेतक, खराब स्ट्रीट लाइट और बिना सुरक्षा के डिवाइडर दुर्घटनाओं की गंभीरता बढ़ाते हैं। चौड़ी सड़कों का निर्माण तो तेजी से हुआ, पर उनके साथ स्पीड नियंत्रण के उपाय पर्याप्त नहीं जोड़े गए। दुर्घटना के बाद “गोल्डन ऑवर” में समय पर चिकित्सा न मिलना कई मौतों को बढ़ा देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रॉमा सेंटरों की कमी, एम्बुलेंस की देरी और प्राथमिक उपचार की अपर्याप्त व्यवस्था स्थिति को और बिगाड़ती है। सबसे पहले ओवरस्पीडिंग पर तकनीक आधारित सख्त नियंत्रण जरूरी है। हर प्रमुख मार्ग पर ऑटोमैटिक स्पीड डिटेक्शन और लगातार ई-चालान व्यवस्था लागू की जाए। चिन्हित ब्लैक स्पॉट का समयबद्ध सुधार और थर्ड-पार्टी सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य हो। बार-बार नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस निलंबन और भारी दंड का प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। स्कूल स्तर से सड़क सुरक्षा शिक्षा को व्यवहारिक रूप दिया जाए ताकि जिम्मेदार ड्राइविंग संस्कृति विकसित हो।




