राजस्थान के नगर निकाय चुनावों के बाद कई जगह स्पष्ट बहुमत नहीं होने से बोर्ड गठन का गणित गठजोड़ पर टिक गया है। 309 निकायों में भाजपा को 85 और कांग्रेस को 46 में स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि करीब 177 निकायों में निर्दलीय या अन्य दलों के पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका में हैं। जहां किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां मेयर अथवा सभापति का चुनाव गठजोड़, समर्थन और पार्षदों की संख्या के गणित पर निर्भर हो गया है। विधायक और सांसद भी अपने-अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने के लिए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। जयपुर में मेयर चुनाव को लेकर विधायकों की पसंद और पार्षदों की राय पर चर्चा की खबरें सामने आई हैं, जबकि जोधपुर जैसे निकायों में निर्दलीय पार्षद निर्णायक स्थिति में पहुंच गए हैं। निर्दलीय पार्षदों की बड़ी संख्या ने कई निकायों में बोर्ड गठन को और पेचीदा बना दिया है। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि मेयर या सभापति कौन बनेगा? बड़ा सवाल यह है कि जो बोर्ड जोड़-तोड़ से बनेगा, वह शहर के विकास के लिए कितनी मजबूती से काम कर पाएगा?
बहुमत जुटाने के लिए यदि अलग-अलग विचारों और हितों वाले पार्षदों का साथ लिया जाता है तो आगे चलकर आपसी खींचतान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। समर्थन देने वाले पार्षद अपने क्षेत्रों के काम और राजनीतिक अपेक्षाओं को लेकर दबाव बनाएंगे। दूसरी तरफ बोर्ड चलाने वाले दल को हर निर्णय पर समर्थन का गणित साधना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सड़क, सफाई, सीवर, पानी, स्ट्रीट लाइट, पार्क और यातायात जैसे रोजमर्रा के मुद्दे राजनीतिक सौदेबाजी के बीच पीछे नहीं छूटने चाहिए। हाल के घटनाक्रमों ने यह चिंता और स्पष्ट कर दी है। जयपुर में मेयर चुनाव से पहले पार्षदों की क्रॉस-वोटिंग की आशंका के बीच राजनीतिक दलों द्वारा अपने पार्षदों को एक जगह रखने की खबरें सामने आई हैं। वहीं धौलपुर में स्पष्ट बहुमत से कुछ सीट दूर रहने वाली कांग्रेस को चेयरपर्सन पद के चुनाव में झटका लगा और निर्दलीय उम्मीदवार के चुने जाने की खबर सामने आई।
यह घटनाक्रम बताता है कि पार्षदों की संख्या और बोर्ड के मुखिया के चुनाव के बीच का राजनीतिक गणित कितना महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन इस पूरी कवायद में जनता के मुद्दे सबसे पीछे नहीं चले जाने चाहिए। जनता ने पार्षद इसलिए नहीं चुने कि चुनाव के बाद होटल, रिसॉर्ट और बैठकों में समर्थन का हिसाब लगाया जाए। जनता ने उन्हें इसलिए चुना है कि वे अपने वार्ड की समस्याएं उठाएं और उनका समाधान कराएं। यदि बोर्ड बनने के बाद भी पार्षद एक-दूसरे को गिराने, बचाने या अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में लगे रहे तो इसका सीधा नुकसान शहर को होगा। गठजोड़ से बोर्ड बने तो भी उसकी प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए—राजनीतिक जोड़-तोड़ नहीं, शहर का विकास। मेयर अथवा सभापति चाहे किसी भी समीकरण से चुना जाए, उसे सभी पार्षदों के साथ मिलकर काम करना होगा। पार्षदों को भी पार्टी और व्यक्तिगत हित से ऊपर अपने वार्ड के मतदाताओं की समस्याओं को रखना होगा। अब जनता को यह देखने का अधिकार है कि नई शहरी सरकार कितनी स्थिर रहती है और कितनी जिम्मेदारी से काम करती है।
बोर्ड टूटे या बचे, समर्थन बदले या कायम रहे—इन सबके बीच जनता के काम रुकने नहीं चाहिए। आखिर शहर किसी राजनीतिक गठजोड़ से नहीं, बल्कि जवाबदेह व्यवस्था और लगातार काम करने से चलता है। विधायक और सांसद यदि अपने अनुभव से मजबूत बोर्ड बनाने में मदद करें, पार्षदों को जनता के प्रति जवाबदेह रहने के लिए प्रेरित करें और शहर के विकास का साझा एजेंडा तैयार करवाएं तो उनकी भूमिका उपयोगी हो सकती है। लेकिन यदि सक्रियता का उद्देश्य केवल अपने समर्थक को मेयर या सभापति बनवाना अथवा राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना रह जाए, तो फिर जनता के सवाल पीछे छूटने का खतरा रहेगा।



