एक कार पर 36 चालान पेंडिंग चलते हैं और फिर भी इसके चलने पर कोई मनाही नहीं। यही कार एक युवक को कुचल देती है। युवक की मौत हो जाती है और सिस्टम पर फिर कई सवाल खड़े कर देती है। इतने चालान पेंडिंग के बाद भी कार फर्राटे से दौड़ती रहती है और ट्रैफिक पुलिस से लेकर आरटीओ, आखिर करता क्या रहा। सड़क सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम तभी प्रभावी माने जाते हैं जब उनका पालन कराने की व्यवस्था भी उतनी ही सख्त हो। लेकिन यदि एक ही वाहन का बार-बार चालान कटता रहे, जुर्माना बकाया हो और वह वाहन फिर भी सड़कों पर बेखौफ दौड़ता रहे, तो यह पूरे तंत्र की विफलता का प्रमाण है। ऐसे अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जहां एक ही वाहन पर दर्जनों ई-चालान लंबित हैं, लेकिन न तो वाहन जब्त होता है और न ही चालक के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई होती है।
ई-चालान व्यवस्था का उद्देश्य तकनीक के माध्यम से नियमों का पालन सुनिश्चित करना था। कैमरे उल्लंघन दर्ज कर लेते हैं, चालान भी जारी हो जाते हैं, लेकिन यदि उनका भुगतान ही न हो और उसके बाद भी वाहन सड़कों पर चलता रहे, तो पूरी व्यवस्था केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है। इससे कानून का डर खत्म होता है और नियम तोड़ने वालों का मनोबल बढ़ता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बार-बार नियम तोड़ने वालों के खिलाफ अलग से कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती? जिन वाहनों पर कई चालान लंबित हैं, उनका पंजीकरण लंबित किया जा सकता है, फिटनेस और अन्य सेवाएं रोकी जा सकती हैं, वाहन जब्त किए जा सकते हैं और बार-बार उल्लंघन करने वालों के ड्राइविंग लाइसेंस भी निलंबित किए जा सकते हैं। लेकिन इन प्रावधानों का प्रभावी उपयोग बहुत कम दिखाई देता है।
दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण तेज गति, रेड लाइट जंप करना, गलत दिशा में वाहन चलाना और अन्य यातायात नियमों का उल्लंघन है। यदि ऐसे वाहन चालकों पर समय रहते अंकुश लगाया जाए तो कई घटनाओं को रोका जा सकता है। केवल जुर्माना बढ़ा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, जब तक उसकी वसूली और अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि परिवहन विभाग, यातायात पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियां एकीकृत प्रणाली विकसित करें। जिन वाहनों पर निश्चित संख्या से अधिक चालान लंबित हों, उनकी सूची तैयार कर विशेष अभियान चलाया जाए। वाहन जब्ती, लाइसेंस निलंबन और बकाया वसूली जैसी कार्रवाई तत्काल की जाए। साथ ही लोगों में यह संदेश भी जाए कि नियम तोड़ने की कीमत केवल चालान नहीं, बल्कि कठोर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
मामला कोई भी हो, जरा सा शोर मचते ही जांच बैठा दी जाती है। बावजूद इसके होता कुछ नहीं है, या तो जांच का नतीजा ही नहीं निकलता या फिर यह पूरी तरह गोलमोल होता है। सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही की कमी है। कई बार जांच का दायरा केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह जाता है, जबकि निर्णय लेने वाले अधिकारी बच निकलते हैं। फाइलों में टिप्पणी बदल जाती है, जिम्मेदारियां इधर-उधर कर दी जाती हैं और अंत में पूरा मामला समय के साथ भुला दिया जाता है। यही लीपापोती अगली त्रासदी की नींव बनती है। सुधार बहुत जरूरी है, सड़क पर हादसों मे कमी तभी आएगी जब वाहन चलाने वालों पर पुख्ता निगरानी हो।



