नई दिल्ली। भारत की रक्षा तैयारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण सिफारिश सामने आई है। संसदीय स्थायी समिति ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की भविष्य की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए नई और महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए अलग बजट हेड बनाने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य ऐसी अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के विकास में तेजी लाना है, जिनमें हाइपरसोनिक हथियार, सुपरसोनिक ग्लाइड सिस्टम और छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान जैसी तकनीकें शामिल हैं। समिति के अनुसार, DRDO वैश्विक रक्षा तकनीक में हो रही तेजी से प्रगति के साथ कदम मिलाने के लिए अगली पीढ़ी की क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इससे भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता और रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सुपरसोनिक ग्लाइड सिस्टम क्यों है खास?
संसदीय समिति ने सुपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल प्रणालियों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल किया है। इस तरह के सिस्टम लॉन्च के बाद तेज गति से ग्लाइड और मैन्यूवर करने की क्षमता रखते हैं। इनकी खासियत यह है कि इनकी उड़ान और दिशा में बदलाव पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में अधिक लचीला हो सकता है। इससे इन्हें ट्रैक और इंटरसेप्ट करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। समिति ने ग्लाइड मिसाइल तकनीक में स्वदेशी अनुसंधान को भारत की रणनीतिक तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण बताया है। इसके लिए पर्याप्त फंडिंग, समयबद्ध लक्ष्य और आधुनिक परीक्षण बुनियादी ढांचे की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
हाइपरसोनिक हथियारों पर DRDO का काम जारी
रक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया है कि DRDO हाइपरसोनिक तकनीक पर काम आगे बढ़ा रहा है। सामान्य तौर पर हाइपरसोनिक प्रणालियां मैक 5 यानी ध्वनि की गति से पांच गुना से अधिक गति से चलने में सक्षम होती हैं। इन प्रणालियों की तेज गति और मैन्यूवर करने की क्षमता विरोधी के लिए प्रतिक्रिया और इंटरसेप्शन को चुनौतीपूर्ण बना सकती है। इसी वजह से दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां हाइपरसोनिक तकनीक के विकास पर तेजी से काम कर रही हैं। भारत में हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल तकनीक पर भी अनुसंधान चल रहा है। DRDO द्वारा स्क्रैमजेट इंजन से जुड़े परीक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी आधार तैयार करने का हिस्सा हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है हाइपरसोनिक तकनीक?
आधुनिक युद्ध में गति, सटीकता, मैन्यूवर करने की क्षमता और अनिश्चित उड़ान मार्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाइपरसोनिक तकनीक इन्हीं क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में काम करती है। स्वदेशी तकनीक विकसित होने से भारत की विदेशी रक्षा तकनीक पर निर्भरता कम हो सकती है और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है। समिति ने इन परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, बेहतर परीक्षण सुविधाओं और निजी उद्योग की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया है।
पाकिस्तान और चीन के संदर्भ में रणनीतिक महत्व
भारत के लिए अत्याधुनिक मिसाइल और एयरोस्पेस तकनीक का विकास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि किसी विशेष हथियार के जरिए पाकिस्तान या चीन की प्रतिक्रिया को लेकर निश्चित दावा करना संभव नहीं है, लेकिन स्वदेशी हाइपरसोनिक और ग्लाइड तकनीक भारत की दीर्घकालिक रक्षा क्षमता को मजबूत कर सकती है। यदि समिति की सिफारिशों के अनुरूप फंडिंग और परीक्षण सुविधाओं को बढ़ाया जाता है, तो DRDO को भविष्य की रक्षा प्रणालियों के विकास में गति मिल सकती है। नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के दौर में ऐसी तकनीकें भारत की रणनीतिक तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।



