नई दिल्ली। विश्व शतरंज के दिग्गज विश्वनाथन आनंद आज भी प्रतियोगिता में उतरने को लेकर उतने ही उत्साहित हैं, जितने अपने करियर के शुरुआती दौर में थे। पांच बार के विश्व चैंपियन आनंद इन दिनों खिलाड़ी की भूमिका के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभाल रहे हैं। इसके बावजूद उनका कहना है कि शतरंज में जीतने की इच्छा कम नहीं हुई है।
आनंद इस समय अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ यानी फिडे में अंतरिम अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इस भूमिका के कारण उनका काफी समय बैठकों, चर्चाओं और संगठन से जुड़े फैसलों में गुजर रहा है। कई बार बैठकें काफी लंबी चलती हैं, लेकिन आनंद के लिए यह व्यस्तता शतरंज से उनके रिश्ते में बाधा नहीं बनी है।
फिडे की जिम्मेदारी संभालने के बाद उनके काम का दायरा पहले से काफी बढ़ गया है। अलग-अलग देशों के अधिकारियों और शतरंज से जुड़े लोगों के साथ लगातार बातचीत करनी पड़ती है। हालांकि, तकनीक की मदद से वह कई काम भारत में रहते हुए ही संभाल लेते हैं। इससे उनकी यात्राओं का दबाव कुछ कम हुआ है।
प्रशासनिक काम के बीच आनंद ने खेल को भी अपनी दिनचर्या से अलग नहीं किया है। वह ग्लोबल चेस लीग के आगामी सत्र में अलास्का नाइट्स के लिए खेलेंगे। टीम प्रतियोगिता में वापसी उनके लिए यह साबित करने का मौका भी है कि उम्र बढ़ने के बावजूद उनका प्रतिस्पर्धी जज्बा कायम है।
आनंद की नजर सिर्फ हिस्सा लेने पर नहीं है। वह अपनी टीम को खिताब दिलाने की कोशिश करेंगे। टीम में युवा भारतीय स्टार अर्जुन एरिगैसी भी शामिल हैं। आनंद और अर्जुन पहले भी साथ खेल चुके हैं, इसलिए दोनों के बीच तालमेल बनाने में ज्यादा परेशानी की उम्मीद नहीं है।
ग्लोबल चेस लीग का प्रारूप भी आनंद के लिए अलग तरह की चुनौती पेश करता है। यहां व्यक्तिगत प्रदर्शन के साथ पूरी टीम के नतीजे का महत्व होता है। ऐसे में अनुभवी खिलाड़ी के तौर पर आनंद की भूमिका केवल बोर्ड पर चाल चलने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टीम के युवा खिलाड़ियों को मार्गदर्शन देने में भी उनका अनुभव काम आ सकता है।
फिडे अध्यक्ष के तौर पर आनंद का कार्यकाल फिलहाल अंतरिम है। संगठन के अगले अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया सितंबर में पूरी होनी है। इसके बाद उनकी प्रशासनिक भूमिका को लेकर तस्वीर साफ होगी।
हालांकि, प्रशासनिक पद पर उनकी मौजूदगी चाहे जितने समय तक रहे, आनंद का शतरंज से रिश्ता खत्म होने वाला नहीं है। पांच विश्व खिताब जीत चुके इस दिग्गज के लिए बिसात पर उतरना अब भी रोमांच पैदा करता है।
56 वर्ष की उम्र में भी आनंद का खेल के प्रति उत्साह यही बताता है कि उनके लिए शतरंज सिर्फ उपलब्धियों का हिस्सा नहीं, बल्कि जिंदगी का लगातार चलने वाला जुनून है। लंबी बैठकों के बाद भी जब वह बोर्ड के सामने बैठते हैं, तो लक्ष्य वही रहता है, बेहतर चाल चलना और जीत की तलाश जारी रखना।



