Saturday, May 16, 2026
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न्यायाधीश के खिलाफ एक भी प्रतिकूल टिप्पणी उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए पर्याप्त : गुजरात उच्च न्यायालय

गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी न्यायाधीश के पूरे सेवा रिकॉर्ड में एक भी प्रतिकूल टिप्पणी या संदिग्ध निष्ठा जनहित में अनिवार्य सेवानिवृत्ति का पर्याप्त आधार है। कारण बताओ नोटिस आवश्यक नहीं है। यह निर्णय सत्र न्यायाधीश जे के आचार्य सहित 17 अन्य न्यायाधीशों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर आधारित है।

अहमदाबाद। गुजरात उच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों से ‘उच्च नैतिक मूल्यों के साथ पूरी ईमानदारी’ बरतने का आह्वान करते हुए कहा है कि किसी न्यायाधीश के पूरे सेवा रिकॉर्ड में उनके खिलाफ एक भी प्रतिकूल टिप्पणी या उनकी निष्ठा पर सवाल ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ के लिए पर्याप्त आधार है। न्यायमूर्ति ए एस सुपेहिया और न्यायमूर्ति एल एस पीरजादा की पीठ ने मंगलवार को सुनाए गए अपने आदेश में कहा कि ऐसे न्यायिक अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी करना भी आवश्यक नहीं है, क्योंकि जनहित में अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना दंड के समान नहीं है।

याचिकाकर्ता जे के आचार्य एक तदर्थ सत्र न्यायाधीश थे और उन्हें नवंबर 2016 में उच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत द्वारा 17 अन्य सत्र न्यायाधीशों के साथ अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया था। उनकी याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रत्येक न्यायाधीश को अपने न्यायिक कर्तव्य का निर्वहन निष्ठा, निष्पक्षता और बौद्धिक ईमानदारी के साथ करना चाहिए, क्योंकि वह जनता के विश्वास का पद धारण करते हैं। उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा, ‘सम्पूर्ण सेवा रिकॉर्ड में एक भी प्रतिकूल टिप्पणी या संदिग्ध निष्ठा, किसी न्यायिक अधिकारी को जनहित में अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के लिए पर्याप्त है। किसी भी पदोन्नति या उच्च वेतनमान/चयन ग्रेड प्रदान करने का अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।’ उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे न्यायिक अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं है।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत के न्यायाधीश किसी न्यायिक अधिकारी को उनकी सामान्य साख के आधार पर अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर सकते हैं, भले ही उनके विरुद्ध कोई ठोस सबूत न हो, और ऐसे आदेश की न्यायिक समीक्षा केवल अत्यंत सीमित आधारों पर ही स्वीकार्य है। आचार्य को 17 अन्य सत्र न्यायाधीशों के साथ अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी, जो उस समय उच्च न्यायालय की नीति का हिस्सा था। इसके तहत 50 और 55 वर्ष की आयु के न्यायाधीशों का मूल्यांकन किया जाता था तथा जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया जाता था उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया जाता था।

आचार्य ने इस फैसले के साथ-साथ राज्य सरकार और राज्यपाल द्वारा इसे लागू करने की कार्रवाई को भी चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि जनहित या प्रशासन के हित में अनिवार्य/समयपूर्व सेवानिवृत्ति का आदेश कोई सजा नहीं है। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत द्वारा जनहित में एक न्यायिक अधिकारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने का निर्णय ‘सभी न्यायाधीशों के सामूहिक विवेक’ को दर्शाता है और विभिन्न चरणों में सावधानीपूर्वक जांच और छान-बीन के बाद प्राप्त ‘व्यक्तिपरक संतुष्टि और विचार-विमर्श’ के महत्व को उजागर करता है। पीठ ने कहा, ‘हम यह दोहराना चाहते हैं कि कभी-कभी संदिग्ध सत्यनिष्ठा को साबित करने के लिए ठोस या भौतिक साक्ष्य जुटाना तथा उसे रिकार्ड का हिस्सा बनाना बहुत कठिन होगा, तथा गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने वाले रिपोर्टिंग अधिकारी या सक्षम नियंत्रण अधिकारी के लिए साक्ष्यों के आधार पर कमियों के विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत करना अव्यावहारिक होगा।’

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Mukesh Kumar
Mukesh Kumarhttps://jagoindiajago.news/
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