नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम समझौते के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने की संभावना के बीच एशियाई तेल बाजार में बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति आने की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एशिया की रिफाइनरियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, क्योंकि क्षेत्र पहले से ही पर्याप्त तेल भंडार के साथ काम कर रहा है।
शिपिंग डेटा के अनुसार, फारस की खाड़ी में करीब 31 सुपरटैंकर फंसे हुए हैं, जिनमें लगभग 6.2 करोड़ बैरल कच्चा तेल लदा हुआ है। जलमार्ग खुलने के बाद ये जहाज एक साथ अपनी मंजिल की ओर रवाना हो सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है, क्योंकि कुछ जहाजों ने अपनी ट्रैकिंग प्रणाली बंद कर रखी हो सकती है।
जानकारों के मुताबिक, यदि समुद्री मार्ग पूरी तरह सामान्य हो जाता है तो यह तेल अपेक्षाकृत कम समय में एशियाई बाजारों तक पहुंच सकता है। भारत तक पहुंचने में लगभग एक सप्ताह और पूर्वी एशिया तक पहुंचने में करीब तीन सप्ताह लग सकते हैं। हालांकि चुनौती यह है कि एशिया की कई रिफाइनरियां पहले से ही पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कर चुकी हैं। पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होने की आशंका के दौरान कंपनियों ने वैकल्पिक स्रोतों से अतिरिक्त तेल खरीद लिया था।
इसके अलावा, ऊंची तेल कीमतों के कारण ईंधन की मांग पर असर पड़ा, जिसके चलते कई रिफाइनरियों ने अपनी प्रसंस्करण क्षमता भी घटा दी थी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी मात्रा में तेल एक साथ बाजार में पहुंचता है, तो इससे आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन पर भी देखने को मिल सकता है।
निवेशक और ऊर्जा कंपनियां अब इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही कितनी तेजी से सामान्य होती है और बाजार अतिरिक्त आपूर्ति को किस तरह समाहित करता है। फिलहाल संकेत यही हैं कि आने वाले समय में एशियाई ऊर्जा बाजार में आपूर्ति बढ़ने से कीमतों पर दबाव बन सकता है।



