नई दिल्ली। 11 जुलाई को दुनिया आज विश्व जनसंख्या दिवस मना रही है। भारत सरकार की ‘भारत की जनगणना 2036 : जनसंख्या का अनुमान’ रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में प्रदेश की अनुमानित आबादी 8 करोड़ 38 लाख 79 हजार होगी, जो पिछले वर्ष के 8 करोड़ 30 लाख 60 हजार से 8.19 लाख अधिक है। इनमें 15 से 39 वर्ष आयु वर्ग के 3 करोड़ 58 लाख 57 हजार युवा होंगे, जो कुल आबादी का 42.87 प्रतिशत हैं। यानी हर 100 राजस्थानियों में लगभग 43 युवा होंगे। कभी यह दिन केवल बढ़ती आबादी के आंकड़ों और जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा तक सीमित था, लेकिन बदलते समय के साथ इसका अर्थ भी बदल गया है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि दुनिया में कितने लोग हैं, बल्कि यह है कि क्या हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और सुरक्षित जीवन मिल पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया की आबादी अब 8 अरब से अधिक हो चुकी है और आने वाले दशकों में इसके बढ़ने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि वैश्विक जनसंख्या 2080 के दशक के मध्य तक लगभग 10.3 अरब के स्तर पर पहुंच सकती है। हालांकि इसके बाद धीरे-धीरे इसमें कमी आने की संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि जनसंख्या अपने आप में समस्या नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि समाज और सरकारें बदलती आबादी की जरूरतों के अनुसार कितनी तैयारी कर रही हैं। विश्व जनसंख्या दिवस की शुरुआत वर्ष 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की पहल पर हुई थी। पहली बार इसे 11 जुलाई 1990 को मनाया गया। इसका उद्देश्य जनसंख्या से जुड़े मुद्दों, विकास, पर्यावरण और मानव अधिकारों के बीच संबंधों पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करना था।
दुनिया के 8 सबसे अधिक आबादी वाले देश
भारत – लगभग 141 करोड़
चीन – लगभग 140 करोड़
अमेरिका – लगभग 34 करोड़
इंडोनेशिया – लगभग 28.5 करोड़
पाकिस्तान – लगभग 25.5 करोड़
नाइजीरिया – लगभग 23.7 करोड़
ब्राज़ील – लगभग 21.2 करोड़
बांग्लादेश – लगभग 17.5 करोड़
आबादी बढ़ने से ज्यादा जरूरी है जीवन की गुणवत्ता
तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। जब शहरों और गांवों का विकास जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार के साथ नहीं चलता, तो स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था, आवास और रोजगार पर दबाव बढ़ने लगता है। कई विकासशील देशों में तेजी से बढ़ते शहरों के कारण ट्रैफिक, प्रदूषण, पानी की कमी और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार के सीमित अवसर लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी आबादी को बोझ मानने के बजाय मानव संसाधन के रूप में देखना जरूरी है। इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास में लगातार निवेश करना होगा।
बदल रही है परिवार की सोच
भारत समेत कई देशों में परिवार को लेकर लोगों की सोच तेजी से बदल रही है। आज के युवा दंपति पहले की तुलना में छोटे परिवारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके पीछे बढ़ती जीवन लागत, बच्चों की बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और करियर से जुड़ी प्राथमिकताएं बड़ी वजह हैं। शहरी क्षेत्रों में कई युवा परिवार मानते हैं कि कम बच्चों के साथ वे उन्हें बेहतर अवसर और अधिक समय दे सकते हैं। दोहरी आय वाले परिवारों में भी यह सोच मजबूत हुई है कि परिवार का आकार छोटा हो, लेकिन बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं और अवसरों की गुणवत्ता बेहतर हो। हालांकि, जनसंख्या में गिरावट वाले देशों के सामने अब नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। कई विकसित देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और काम करने वाली आबादी कम हो रही है। ऐसे देशों को स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन व्यवस्था और श्रम बाजार में बदलाव की जरूरत पड़ रही है।
महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य से बदलती तस्वीर
जनसंख्या और विकास के बीच महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की रिपोर्टों में लगातार यह बात सामने आती रही है कि जहां महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता मिलती है, वहां परिवार और समाज दोनों बेहतर तरीके से आगे बढ़ते हैं। महिलाओं की शिक्षा बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, स्वास्थ्य बेहतर होता है और परिवार नियोजन से जुड़े फैसले अधिक जागरूक तरीके से लिए जाते हैं।
पर्यावरण पर बढ़ता दबाव
बढ़ती आबादी का असर पर्यावरण पर भी दिखाई दे रहा है। अधिक लोगों के लिए अधिक जमीन, पानी, ऊर्जा और भोजन की जरूरत होती है। यदि संसाधनों का सही प्रबंधन नहीं किया जाए तो इसका असर जंगलों, नदियों, हवा और जैव विविधता पर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि समस्या केवल लोगों की संख्या नहीं है, बल्कि संसाधनों के इस्तेमाल का तरीका भी महत्वपूर्ण है। बेहतर योजना, स्वच्छ ऊर्जा, स्मार्ट शहर और टिकाऊ विकास मॉडल अपनाकर बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।
जनसंख्या नहीं, तैयारी तय करेगी भविष्य
UNFPA की 2025 रिपोर्ट ने यह भी बताया कि कई लोग आर्थिक और सामाजिक कारणों से उतने बच्चे नहीं कर पा रहे हैं जितने वे चाहते हैं। महंगाई, रोजगार की अनिश्चितता और भविष्य की चिंता परिवारों के फैसलों को प्रभावित कर रही है। इससे साफ है कि जनसंख्या का मुद्दा केवल संख्या का नहीं, बल्कि अवसरों और अधिकारों का भी है। सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षित जीवन उपलब्ध करा सकें। विश्व जनसंख्या दिवस का संदेश यही है कि इंसान किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी है। सही योजना और निवेश के साथ बड़ी आबादी किसी चुनौती से ज्यादा विकास की ताकत बन सकती है। आने वाला भविष्य इस बात से तय होगा कि दुनिया में कितने लोग हैं नहीं, बल्कि यह कि उन लोगों को कितने बेहतर अवसर दिए जाते हैं।



