नई दिल्ली। जब भी किसी खबर की हेडलाइन आती है कि “नाबालिग ने रेप की वारदात को अंजाम दिया”, तो समाज में गुस्सा और चिंता दोनों बढ़ जाते हैं। सवाल उठता है, आखिर इतनी कम उम्र में कोई इतना गंभीर अपराध कैसे कर सकता है? क्या सच में रेप जैसे अपराधों में ज्यादातर आरोपी नाबालिग हैं? सरकारी आंकड़ों की तस्वीर इससे थोड़ी अलग है। आंकड़े बताते हैं कि नाबालिग आरोपियों से जुड़े मामले गंभीर चिंता का विषय जरूर हैं, लेकिन वे देश में दर्ज कुल रेप मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा नहीं हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) भारत में अपराधों से जुड़े आंकड़े जारी करता है। इसके अनुसार, किशोर अपराध और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया जाता है। नाबालिग आरोपियों के मामलों में बढ़ोतरी और चर्चा का एक कारण यह भी है कि अब कई ऐसे मामले रिपोर्ट हो रहे हैं जो पहले सामने नहीं आते थे। खासकर बच्चियों से जुड़े यौन अपराधों के लिए बने POCSO Act के तहत दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर नाबालिग आरोपी एक हिंसक अपराधी नहीं होता और हर मामला एक जैसा नहीं होता। यौन अपराधों से जुड़े कई अध्ययनों में सामने आया है कि बड़ी संख्या के मामलों में आरोपी पीड़ित का परिचित, रिश्तेदार, पड़ोसी या जान-पहचान वाला व्यक्ति होता है। यानी खतरा हमेशा किसी अनजान व्यक्ति से ही हो, ऐसा नहीं है। यही वजह है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए जागरूकता और भरोसे का माहौल बनाना बेहद जरूरी है।
आंकड़ों के पीछे छिपी है एक बड़ी कहानी
जब भी किसी गंभीर अपराध में आरोपी की उम्र कम होती है, तो वह मामला तुरंत लोगों का ध्यान खींचता है और समाज में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद यह धारणा बनने लगती है कि नाबालिगों में अपराध तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आंकड़ों और कानून की पूरी तस्वीर को समझना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों के पीछे सिर्फ अपराध की मानसिकता नहीं, बल्कि कई सामाजिक और कानूनी पहलू भी जुड़े होते हैं जैसे किशोर उम्र की समझ, इंटरनेट का बढ़ता प्रभाव, परिवार में संवाद की कमी, सहमति से जुड़े कानून और रिपोर्टिंग के बढ़ते मामले। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आरोपी की उम्र क्या थी, बल्कि यह भी है कि आखिर वे परिस्थितियां क्या थीं, जिन्होंने एक किशोर को अपराध या कानून के दायरे तक पहुंचाया।
हाल के कुछ मामले
- आगरा, उत्तर प्रदेश (2024)
एक नाबालिग लड़के पर एक छोटी बच्ची से दुष्कर्म का आरोप लगा। आरोपी की उम्र कम होने के कारण उसे Juvenile Justice System के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस मामले ने कम उम्र में गंभीर अपराधों को लेकर बहस तेज कर दी। - बेंगलुरु, कर्नाटक (2025)
एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के मामले में पुलिस ने कई आरोपियों को पकड़ा। जांच में एक आरोपी के नाबालिग होने की बात सामने आई। मामले ने किशोरों की ऑनलाइन गतिविधियों और सुरक्षा पर सवाल उठाए। - हुबली, कर्नाटक (2025)
एक नाबालिग लड़की के अपहरण और यौन अपराध से जुड़ा मामला सामने आया। इस केस में पुलिस कार्रवाई और बच्चों की सुरक्षा को लेकर चर्चा हुई। घटना ने नाबालिगों के खिलाफ अपराधों की गंभीरता को सामने रखा। - दावणगेरे, कर्नाटक (हालिया मामला)
एक गैंगरेप मामले में पुलिस कार्रवाई के दौरान एक नाबालिग आरोपी के शामिल होने की जानकारी सामने आई। मामले ने किशोर अपराध और साथियों के प्रभाव जैसे मुद्दों पर ध्यान खींचा। - महाराष्ट्र (हालिया मामला)
एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण के मामले में नाबालिग आरोपी का नाम सामने आया। यह मामला बच्चों की सुरक्षा और परिवार/करीबी लोगों के बीच सतर्कता की जरूरत को दिखाता है।
क्यों बढ़ रहे हैं नाबालिग आरोपियों से जुड़े मामले?
- सहमति की उम्र और POCSO कानून की जटिलता
भारत में कानूनन सहमति (Consent) की उम्र 18 साल है। इसका मतलब है कि 18 साल से कम उम्र में किसी भी तरह का यौन संबंध कानून की नजर में सहमति से हुआ संबंध नहीं माना जाता। कई मामलों में किशोरों के बीच रिश्ते या प्रेम संबंध भी POCSO कानून के दायरे में आ जाते हैं। ऐसे मामलों में आरोपी खुद भी नाबालिग हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में हर घटना को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। कुछ मामलों में जबरदस्ती और शोषण होता है, जबकि कुछ मामलों में किशोर संबंधों की जटिल स्थिति सामने आती है। - इंटरनेट और आसानी से उपलब्ध कंटेंट
आज कम उम्र में ही बच्चों की पहुंच इंटरनेट तक हो गई है। बिना निगरानी के मिलने वाला गलत या हिंसक कंटेंट किशोरों की सोच और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल दुनिया में बच्चों को सही जानकारी और ऑनलाइन सुरक्षा की समझ देना बेहद जरूरी है। - यौन शिक्षा और संवाद की कमी
कई परिवारों और स्कूलों में आज भी शरीर, रिश्तों और यौन सुरक्षा जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत नहीं होती। “गुड टच-बैड टच”, सहमति और सीमाओं की जानकारी बच्चों को समय रहते दी जाए तो वे सही फैसले लेने में बेहतर सक्षम हो सकते हैं।
क्या हर नाबालिग आरोपी को सिर्फ अपराधी मानना सही है?
कानून अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखता है, लेकिन किशोर न्याय व्यवस्था यह भी मानती है कि कम उम्र के व्यक्ति के व्यवहार को सुधार और पुनर्वास के नजरिए से देखा जाना चाहिए। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि गंभीर अपराधों को नजरअंदाज किया जाए। पीड़ितों को न्याय और सुरक्षा देना सबसे महत्वपूर्ण है। नाबालिगों से जुड़े यौन अपराधों के मामले समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं। लेकिन इन आंकड़ों को समझते समय भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों को भी देखना जरूरी है। जरूरत है बच्चों से खुलकर बातचीत की, डिजिटल दुनिया की सही समझ की, बेहतर यौन शिक्षा की और ऐसी व्यवस्था की जिसमें अपराध रोकने के साथ-साथ पीड़ितों को न्याय भी मिले। क्योंकि समस्या सिर्फ यह नहीं है कि अपराधी की उम्र क्या है, बल्कि यह भी है कि समाज अपने बच्चों को किस तरह की जानकारी, सुरक्षा और दिशा दे रहा है।



