प्रतीक चौवे, संपादक
एआई को किसानों का नया दोस्त बताया जा रहा है। जयपुर से केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने भारत विस्तार ऐप का शुभारंभ करते हुए दावा किया कि किसानों को उनकी भाषा में कृषि से जुड़ी सटीक जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाएंगी। कृषि में डिजिटल क्रांति का यह उद्घोष कितना कारगर होगा यह तो समय ही बताएगा। हां, किसानों को आज के नए दौर से जोड़ा जाना सराहनीय कदम है। मंत्री शिवराज चौहान ने इसके तमाम फायदे गिनाए और यह भी कहा कि इससे कृषि के क्षेत्र में पारदर्शिता आएगी।
सवाल यह है कि क्या यह पहल वास्तव में खेत तक फायदा पहुंचा पाएगी, या फिर यह भी कागजी योजनाओं तक सीमित रह जाएगी? यह भी सच है कि देश का किसान ही सबसे अधिक संकटों से जूझ रहा है। खेत से मंडी तक की यात्रा में किसान को आर्थिक, प्राकृतिक और नीतिगत कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि कृषि क्षेत्र में असंतोष और असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
हाल ही में हुए अमेरिकी व्यापार समझौते में भारतीय किसानों के हितों की उपेक्षा करने का भी हल्ला मचा हुआ है। हकीकत तो यह है कि बीज, खाद, डीजल, बिजली और कीटनाशकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि फसलों के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ते। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा तो होती है, लेकिन हर किसान को इसका लाभ नहीं मिल पाता। कई बार खुले बाजार में एमएसपी से कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है। मौसम की अनिश्चितता खेती को जोखिम भरा बना चुकी है। फसल बीमा योजनाएं हैं, लेकिन मुआवजा समय पर और पर्याप्त नहीं मिल पाता। कम आय और अनिश्चित उत्पादन के कारण किसान अक्सर कर्ज लेने को मजबूर होते हैं। सहकारी बैंक और सरकारी योजनाओं के बावजूद साहूकारों से लिया गया महंगा कर्ज कई परिवारों को आर्थिक संकट में डाल रहा है।
किसान उत्पादन करता है, लेकिन मूल्य निर्धारण में उसकी भूमिका नगण्य है। मंडी व्यवस्था में बिचौलियों का दबदबा रहता है। इससे किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। देश में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। जमीन का लगातार बंटवारा होने से खेती लाभकारी नहीं रह जाती। आधुनिक तकनीक और मशीनरी का उपयोग भी सीमित हो जाता है। कृषि क्षेत्र में नई-नई योजनाओं और ऐप आधारित पहल की घोषणा करना आसान है, लेकिन क्या जमीन पर हालात ऐसे हैं कि किसान इन डिजिटल पहलों का पूरा लाभ उठा सके? जब खेत, पानी, लागत और बाजार की बुनियादी समस्याएं अब भी जस की तस हैं, तब केवल एक ऐप से तस्वीर बदलने की उम्मीद कितनी व्यावहारिक है, यह गंभीर सवाल है।
खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। यदि किसान को फसल का लाभकारी मूल्य ही नहीं मिलेगा, तो किसी भी ऐप के जरिए बाजार जोड़ देने से उसकी आय में स्थायी सुधार नहीं होगा। पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रभावी खरीद व्यवस्था मजबूत करनी होगी। ऐप आधारित योजनाएं तभी कारगर होंगी जब किसान के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और तकनीकी समझ होगी। अभी भी बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान डिजिटल माध्यमों से दूर हैं। तकनीक सहायक हो सकती है, लेकिन वह आधारभूत समस्याओं का विकल्प नहीं है। यदि उत्पादन लागत, सिंचाई, बीमा, बाजार और मूल्य सुरक्षा के मुद्दे अनसुलझे रहेंगे, तो कोई भी ऐप किसानों की आय में चमत्कार नहीं कर सकता।




