प्रतीक चौवे, संपादक
पेड़ ‘अतिक्रमण’ माने जा रहे हैं, तो हरियाली हटाना बहादुरी का ‘करतब’। बीकानेर में चल रहे ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ का शोर शायद सबको सुनाई दे रहा है। राज्य वृक्ष खेजड़ी काटे जाने का यह विरोध कोई मामूली नहीं है, उनके लिए भी जिन्हें यह न दिखाई दे रहा है न सुनाई। सोलर ऊर्जा को स्वच्छ, पर्यावरण-हितैषी और भविष्य की जरूरत बताया जा रहा है, लेकिन उसी ऊर्जा के लिए मरुस्थल की जीवनरेखा कही जाने वाली खेजड़ी को काटा जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
विडंबना यह है कि जिस सोलर ऊर्जा को कार्बन उत्सर्जन घटाने का समाधान बताया जा रहा है, वही ऊर्जा स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान का कारण बन रही है। पर्यावरण स्वीकृति और पौधरोपण के वादे होते हैं, तो उनको निभाया क्यों नहीं जा रहा? क्यों दशकों पुराने पेड़ काटे जा रहे हैं। खेजड़ी मरुस्थल में जीवन का पर्याय है। इसे काटना सिर्फ हरियाली को मिटाना नहीं, बल्कि पशुपालन, खेती और स्थानीय संस्कृति पर प्रहार है। जब ऐसे वृक्ष बिना भरोसेमंद संवाद और पारदर्शी प्रक्रिया के काटे जाते हैं, तो लोगों का गुस्सा जायज है। कुछ पौधे लगाने या मुआवजे की घोषणा कर देने मात्र से पर्यावरण के लिए कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं हो जाएगा।
इतिहास गवाह है कि बरसों पहले खेजड़ी की रक्षा के लिए 363 लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज जब विकास के नाम पर उसी खेजड़ी को काटा जा रहा है, तो यह सवाल उठेगा ही क्या विकास की परिभाषा प्रकृति-विनाश के बिना संभव नहीं? बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि विकसित की जा रही है। इन परियोजनाओं के लिए कई स्थानों पर खेजड़ी के पुराने पेड़ों को हटाया जा रहा है ताकि जमीन पर सोलर पैनल और संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर लगाया जा सके। विकास आवश्यक है, इसमें कोई दो राय नहीं। सोलर ऊर्जा जैसी परियोजनाएं भविष्य की जरूरत हैं, लेकिन क्या विकास का मतलब यही रह गया है कि पहले पेड़ काटो, फिर कुछ पौधे लगाकर कागजी संतुलन बना लो? वर्षों पुराने वृक्ष की जगह लगाए गए नन्हे पौधे न तो तुरंत छाया देते हैं, न पर्यावरणीय संतुलन।
यह ‘कटो और गिनती पूरी करो’ वाली नीति हरियाली नहीं, सिर्फ आंकड़ों की हरियाली है। बात केवल खेजड़ी की ही नहीं हो रही, राजधानी जयपुर समेत पूरे प्रदेश में कटते अनगिनत पेड़, नष्ट होती हरियाली किसी से छिपी नहीं है। यह भी सही है कि अब हरियाली को बचाने के लिए आंदोलन कम ही हो रहे हैं, शिकायतें अनसुनी की जा रही है, सड़क चौड़ी करने या नए प्रोजेक्ट के नाम से पेड़ों की कटाई को देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है। अतिक्रमण-अवैध निर्माण से ‘पर्यावरण’ को कोई नुकसान नहीं, संभवतया इसलिए उन्हें नहीं हटाया जाता।
खेजड़ी की रक्षा के लिए बीकानेर में चल रहे महापड़ाव में किसान-व्यापारी ही नहीं पर्यावरण कार्यकर्ता और संत समाज भी है। जब इस मुद्दे पर इतने लोग एकजुट हों, तो इसकी गंभीरता समझनी होगी। सवाल उनसे भी पूछे जाने चाहिएं जो हर साल पौधरोपण तो करते हैं पर बाद में इन पौधों की सार-संभाल नहीं करते। सरकार करोड़ों खर्च कर हरियाली बढ़ाने का दावा करती है पर यह नजर नहीं आता। हरियाली बढ़ाने से खुशहाली आएगी, यह बरसों से सुनते आ रहे हैं। बीकानेर में चल रहा महापड़ाव केवल खेजड़ी नहीं , यह उन पेड़ों के लिए भी है जो बेवजह काटे जा रहे हैं।




