प्रतीक चौवे, संपादक
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को निशुल्क दवाएं नहीं मिल रही। आलम यह है कि मरीज इधर-उधर महंगी रेट पर इन्हें खरीद रहे हैं। मुफ्त दवाओं का न मिल पाना सिस्टम की लापरवाही है। सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीज इस उम्मीद से पहुंचते हैं कि उन्हें मुफ्त जांच और निशुल्क दवाओं का लाभ मिलेगा। हकीकत यह है कि अब वहीं पर जरूरी दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति न केवल सरकारी योजनाओं की साख पर सवाल खड़े करती है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता भी उजागर करती है। सरकार ने आमजन को राहत देने के लिए निशुल्क दवा योजना शुरू की थी, ताकि इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। ऐसे में बार-बार दवाओं की किल्लत से मरीजों को निराश होना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में निशुल्क दवाओं का करीब एक महीने से टोटा है। इसमें बीपी, शुगर, हार्ट ही नहीं खांसी-बुखार तक की दवाएं शामिल हैं। अस्पतालों में इनका न मिलने का कारण यह बताया जा रहा है कि इन दिनों सप्लाई ही बंद है।
एसएमएस, जेके लोन जैसे अस्पतालों के ओपीडी-आईपीडी में 50 से ज्यादा दवाएं एक महीने से आउट ऑफ स्टॉक हैं। बार-बार दवाओं की किल्लत के पीछें कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण खरीद और आपूर्ति प्रक्रिया की सुस्ती है। दवा खरीद के टेंडर समय पर नहीं होते, भुगतान में देरी होती है और सप्लाई चेन की निगरानी कमजोर रहती है। नतीजन कंपनियां समय पर दवा नहीं भेजतीं और अस्पतालों में स्टॉक खत्म हो जाता है। कई जगहों पर मांग का सही आकलन नहीं होने से भी दवाओं की कमी पैदा हो जाती है।अनेक अस्पतालों में दवा भंडारण और वितरण की व्यवस्था अभी भी मैनुअल या आधी-अधूरी डिजिटल प्रणाली पर निर्भर है। रियल-टाइम मॉनिटरिंग न होने से यह पता ही नहीं चलता कि किस दवा का स्टॉक कब खत्म होने वाला है। इससे समय रहते नई आपूर्ति का आदेश नहीं हो पाता और मरीजों को खाली हाथ लौटना पड़ता है।
ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि सरकारी स्टॉक की दवाएं बाहर के मेडिकल स्टोर तक पहुंच जाती हैं। हालांकि हर जगह ऐसा नहीं होता, लेकिन जहां भी ऐसा होता है, वहां यह सीधे-सीधे गरीब मरीज के हक पर डाका है। मुफ्त दवा योजना का उद्देश्य गरीब को इलाज की चिंता से मुक्त करना है। दवा खरीद और वितरण प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। हर अस्पताल में रियल-टाइम स्टॉक मॉनिटरिंग लागू हो और कमी होने से पहले ही आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। जहां भी लापरवाही या गड़बड़ी मिले, वहां जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही पर्याप्त बजट और बफर स्टॉक की व्यवस्था भी जरूरी है। निशुल्क दवा योजना केवल घोषणा भर नहीं, बल्कि गरीब मरीज के भरोसे का सवाल है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वो इस भरोसे को बनाए रखे।




