जयपुर। जयपुर को दुनिया के 20 सर्वश्रेष्ठ कला और सांस्कृतिक शहरों की सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में जगह पाने वाला जयपुर भारत का एकमात्र शहर है। जयपुर की यह विशेष उपलब्धि पर राजस्थान के लिए बड़े सम्मान की बात है। इस कीर्तिमान से जब राजस्थान और राजस्थानी भाषा की चर्चा शुरू हुई तो जाहिर सी बात है राजस्थानी सिनेमा कैसे अलग-थलग रह जाता। मजे की बात यह कि इसी शहर में राजस्थानी सिनेमा के उत्थान के लिए निर्माता-निर्देशक भविष्य की रणनीति पर मंथन के लिए एकत्र हुए हैं।
राजस्थानी सिनेमा को पुनर्जीवित करने और उसे नई दिशा देने के उद्देश्य से इस तरह की सेमिनार/कार्यशाला और अधिवेशन पहले भी हुए हैं, बावजूद इसके कोई खासा परिणाम नहीं निकला। तेलुग, मराठी, मलयालम जैसे क्षत्रीय भाषाओं का सिनेमा अपने राज्य तक सीमित नहीं है, यह अखिल भारतीय स्तर पर बॉलीवुड और उत्तर भारत के अन्य सिनेमाघरों को पीछे छोड़ चुका है।
आलम यह है कि इन्हीं की हिंदी में डब की गई फिल्में पूरे देश में अपना जलवा बिखेर रही हैं। समय-समय पर राजस्थानी सिनेमा के पीछे रहने के अनगिनत कारण गिनाए जाते हैं। कभी सरकार के सहयोग नहीं करने की बात कही जाती है तो कभी सिनेमाघरों के अभाव या मार्केटिंग की बात कह दी जाती है। यह भी सही है कि राजस्थानी फिल्मों के पास उचित डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क नहीं है। सिनेमाघरों में अन्य बड़ी हिंदी या हॉलीवुड फिल्मों के दबदबे के कारण राजस्थानी फिल्मों को स्क्रीन और दर्शक दोनों नहीं मिल पाते।
कभी-कभी भाषा के पग-पग पर बदलाव को भी सफलता की मुख्य बाधा कह दिया जाता है। प्रदेश के मुख्य निर्माताओं ने राजस्थानी सिनेमा के गिरते स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसे पुनः गौरवशाली बनाने की कार्ययोजना तैयार की। सेमिनार में हिस्सा लेने वाले सभी फिल्मकारों ने इस बात पर जोर दिया कि वे आने वाले समय में एक व्यवस्थित रणनीति के तहत काम करेंगे ताकि राजस्थानी भाषा और संस्कृति को बड़े पर्दे पर एक गरिमापूर्ण स्थान मिल सके।
इस बार भी मंथन में कुछ नया नहीं हुआ, राजस्थानी सिनेमा की सफलता के उन बिंदुओं पर तो चर्चा ही नहीं की गई जिनकी वजह से यह आगे नहीं बढ़ पा रहा। अब राजस्थानी सिनेमा आगे बढ़े कैसे, इस पर भी विचार किया जाना जरूरी है। असल में अलग-अलग गुटबाजी, अपने-अपने फायदे उठाने की होड़ और दूसरों को पीछा धकेलना, राजस्थानी सिनेमा के आगे नहीं बढ़ने की मुख्य वजह है। न एक मंच तैयार हुआ जो राजस्थानी सिनेमा की सफलता में आ रही रुकावट को दूर करने के लिए सरकार पर दबाव डालता-बातचीत करता। राजस्थानी फिल्में कम बजट में बनती हैं, उनमें भी अिधकांश सरकार से फायदे की उम्मीद लगा बैठते हैं।
तकनीकी स्तर पर फिल्में बेहतर बनें, इनकी पहंुच दर्शकों तक आसान हो, इसके लिए टैक्स कम किया जाए। साथ ही केवल सामाजिक या फिर पौराणिक कथाओं के आधार पर ही फिल्में न बनें, समसामयिक मुद्दे-आंदोलन और जनता की पसंद को भी प्राथमिकता दी जाए।



