PNG Gas Connection: ईरान जंग के कारण पैदा हुए गैस संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने नया आदेश जारी कर पाइपलाइन प्राकृतिक गैस (PNG) को एक तरह से अनिवार्य कर दिया है। जैसा की खबरों में बताया जा रहा है कि जिन घरों के आसपास पीएनजी उपलब्ध हैं, वहां के निवासियों को 3 महीने के अंदर कनेक्शन लेना होगा, वरना उनका एलपीजी रसोई गैस सिलेंडर बंद कर दिया जाएगा। दावा यह भी किया जा रहा है कि इससे पाइप के जरिए घरों में पहुंचने वाली रसोई गैस (पीएनजी) के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही इस बदलाव से उपभोक्ताओं पर अत्यधिक वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि सरकार ने सोच-समझकर ही यह आदेश तुरत-फुरत में जारी किया होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह भी कि जनता का ध्यान रखते ही पीएनजी पर अचानक इतना फोकस करने की जल्दबाजी क्यों? देश में पीएनजी को स्वच्छ और सुविधाजनक ऊर्जा विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य यह भी है कि शहरों में रसोई गैस सिलेंडर की निर्भरता कम हो और घर-घर पाइपलाइन से गैस पहुंचे।
बावजूद इसके जमीनी हकीकत यह बताती है कि पीएनजी की पहुंच अभी भी सीमित है और इसका विस्तार अपेक्षा के अनुसार तेज नहीं हो पाया है। बड़े शहरों को छोड़ दें तो कस्बे-गांवों में अभी इसके बारे में जनता को पूरी जानकारी तक नहीं है। बरसों से चल रहे इस पीएनजी सिस्टम को क्यों घरों तक पहुंचने में इतना समय लग रहा है, इस पर भी सोचने की आवश्यकता है। अब सवाल यह भी है कि गैस की किल्लत के समय में एकदम से पीएनजी का ध्यान आया कैसे? पीएनजी से जोड़ने के लिए देश में बरसों से कार्य हो रहा है, इसके बाद भी हकीकत यह है कि अभी तक भी 80 फीसदी आबादी इससे नहीं जुड़ पाई है। इसके भी कई कारण हैं, कई शहरों में पीएनजी नेटवर्क सीमित इलाकों तक ही पहुंचा है। एक ही शहर में कुछ कॉलोनियों को सुविधा मिलती है, जबकि आसपास के क्षेत्र इससे वंचित रह जाते हैं। उपभोक्ता चाहकर भी कनेक्शन नहीं ले पाते क्योंकि उनके इलाके तक पाइपलाइन पहुंची ही नहीं होती। दूसरी बड़ी वजह शुरुआती लागत है। पीएनजी कनेक्शन के लिए इंस्टॉलेशन शुल्क, पाइपलाइन फिटिंग और सुरक्षा उपकरणों का खर्च देना पड़ता है। कई मध्यम और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ता इसे अतिरिक्त बोझ मानते हैं, खासकर तब जब एलपीजी सिलेंडर पहले से उपलब्ध हो। एक बड़ा कारण मानसिकता और भरोसे का है। सिलेंडर सिस्टम बरसों से चला आ रहा है और लोग उससे परिचित हैं।
नई व्यवस्था को लेकर सुरक्षा और बिलिंग से जुड़े सवाल भी सामने आते हैं। कई उपभोक्ता यह सोचकर भी पीछे हटते हैं कि गैस का बिल बढ़ सकता है या आपूर्ति में बाधा आ सकती है। इसके अलावा प्रक्रिया भी आसान नहीं मानी जाती। कनेक्शन के लिए आवेदन, निरीक्षण और इंस्टॉलेशन में समय लगता है। कुछ जगहों पर कंपनियों की प्रतिक्रिया धीमी होने से उपभोक्ता उत्साह खो देते हैं। यह भी सही नहीं है कि जब व्यवस्था ही मजबूत नहीं है तो फिर पीएनजी का कनेक्शन तीन महीने में ही क्यों लेने का दबाव बनाया जा रहा है। पीएनजी नेटवर्क का विस्तार तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से धीमा है। पाइपलाइन बिछाने में समय, निवेश और कई एजेंसियों की अनुमति की जरूरत होती है। कंपनियां भी पहले लाभकारी इलाकों पर ध्यान देती हैं, जिससे बाकी क्षेत्रों में काम लंबित रहता है। यह सही है कि सभी उपभोक्ता पीएनजी से जुड़ें पर सरकार को इसके लिए काम भी तो तेजी से करना होगा? लोग इससे जुड़ क्यों नहीं पा रहे, इसके कारण खोजकर इसका निदान होना चाहिए। पीएनजी की पहल अच्छी है तो इस पर काम तेजी से हो। सरकार को यह भी देखना होगा कि पीएनजी के बाद भी लोग इस तरह गैस किल्लत का शिकार न होने पाएं। विकल्प यहां भी मौजूद रहना चाहिए। वैसे कई सालों से चल रही यह कवायद इतनी फिसड्डी क्यों है, इस पर भी चिंतन होना चाहिए।


