प्रतीक चौवे, संपादक
प्राइवेट बसों की हड़ताल से आम जनजीवन बेहाल है। प्राइवेट बस ऑपरेटर्स और परिवहन विभाग के बीच बातचीत का कोई हल नहीं निकल पा रहा। इस अड़ा-अड़ी के चलते ही जनता परेशान है। हालत यह है कि गिनी-चुनी बसें लोगों को अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचा पा रही हैं। ऑपरेटर्स की मांगें कितनी जायज हैं, यह तो सरकार और विभाग को तय करना है पर लाखों यात्रियों का संकट भी कई सवाल खड़े करता है। ऑपरेटर्स कुछ अधिकारियों को एपीओ करने, टैक्स कम करने, यात्रियों को बीच रास्ते में उतारकर बस सीज करने जैसे कई मुद्दों को लेकर हड़ताल पर हैं।
इसके चलते यह भी सामने आ गया कि राज्य में रोडवेज की बसें नाकाफी हैं। कई कस्बे-गांव जाने के लिए तो प्राइवेट बसें ही एक मात्र सहारा है। प्राइवेट बसों की तुलना में रोडवेज दस फीसदी भी नहीं हैं। रोजमर्रा की आवाजाही के लिए निजी बसों पर निर्भर लाखों यात्रियों—छात्रों, मजदूरों, कर्मचारियों और मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बस स्टैंडों पर लंबी कतारें, महंगे वैकल्पिक साधन और समय पर गंतव्य तक न पहुंच पाने की मजबूरी, आम आदमी की पीड़ा को साफ बयान करती है। बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं, स्टूडेंट के साथ टीचर और अन्य कार्मिकों को भी इन्हीं बसों के सहारे सेंटर तक पहुंचना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक रोजाना बीस लाख से अधिक लोग निजी बसों पर निर्भर हैं, उनकी हड़ताल से प्रदेश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था बेहाल हो गई है।
हड़ताल करने वाले बस संचालकों की अपनी मांगें हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सरकार का दायित्व है कि वह संवाद के जरिए समाधान निकाले। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बार-बार की हड़तालें जनता को बंधक बनाने का माध्यम नहीं बननी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है कि प्राइवेट बसें रुकते ही पूरा तंत्र चरमरा जाता है। राज्य परिवहन की बसों की संख्या सीमित है, रूट कवरेज अधूरा है और कई इलाकों में तो निजी बसें ही एकमात्र सहारा हैं। यह स्थिति बताती है कि सरकार को वैकल्पिक और मजबूत सार्वजनिक परिवहन ढांचा खड़ा करने में गंभीरता दिखानी होगी। हड़ताल के दौरान प्रशासन की तैयारी भी अपर्याप्त नजर आई।
यह भी सही है कि सरकार और विभाग अक्सर तब सक्रिय होते हैं जब विवाद हड़ताल तक पहुंच जाता है। यदि मांगों और शिकायतों पर पहले ही नियमित वार्ता होती रहे, तो टकराव की नौबत कम आए। सड़कों पर बसें थमी हैं, बस अड्डों पर यात्री भटक रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी बाधित हो रही है। समस्या का समाधान होना चाहिए। सरकार का पक्ष भी पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। नियमों का पालन, राजस्व संरक्षण और सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है। हल जल्द होना चाहिए, बस ऑपरेटर्स हो या सरकार, किसी की गलती की सजा जनता क्यों भुगते?




