Friday, February 13, 2026
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सरकारी स्कूलों में मरम्मत के नाम पर तो नहीं लगाया जा रहा ‘चूना’

सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने की कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही। वाटर प्रूफिंग-मरम्मत का कार्य ठीक ढंग से नहीं हो रहा। संस्था प्रधान से ठेकेदार कार्य पूरा होने का 'प्रमाण-पत्र' ले रहे हैं ताकि उनका पेमेंट जल्द से जल्द हो जाए। प्रदेश के कई जिलों से इस तरह की शिकायत मिल रही हैं।

प्रतीक चौवे, संपादक

सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने की कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही। वाटर प्रूफिंग-मरम्मत का कार्य ठीक ढंग से नहीं हो रहा। संस्था प्रधान से ठेकेदार कार्य पूरा होने का ‘प्रमाण-पत्र’ ले रहे हैं ताकि उनका पेमेंट जल्द से जल्द हो जाए। प्रदेश के कई जिलों से इस तरह की शिकायत मिल रही हैं। स्कूलों में वाटर प्रूफिंग और मरम्मत कार्य के लिए प्रति स्कूल करीब दो लाख रुपए तक का बजट स्वीकृत किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई जगह काम आधा-अधूरा कर पूरा दिखाया जा रहा है। यह काम पहली बारिश तक भी टिक पाएगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। नागौर से शुरू हुई शिकायतें अब अन्य जिलों तक फैल रही हैं। कई स्कूलों में छतों पर सिर्फ सतही लेप किया गया, दरारें जस की तस हैं। दीवारों की सीलन दूर करने के बजाय केवल पुताई कर दी गई। करीब दो लाख की राशि छोटे स्कूल के लिए कम नहीं होती। इस रकम में टिकाऊ वाटर प्रूफिंग, आवश्यक मरम्मत और गुणवत्ता सामग्री का उपयोग संभव है। लेकिन जब कार्य की निगरानी ढीली हो तो क्या कहा जा सकता है। संस्था प्रधान न तो इंजीनियर हैं और न ही निर्माण विशेषज्ञ। फिर भी उनसे काम की गुणवत्ता पर अंतिम मुहर मांगी जा रही है। वे प्रमाणपत्र न दें तो विभागीय दबाव, और दे दें तो भविष्य में गड़बड़ी की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ सकती है। यह व्यवस्था उन्हें असहज और असुरक्षित बनाती है।

हाल ही में हुए सर्वे के अनुसार लगभग 91 फीसदी सरकारी स्कूलों में मरम्मत आवश्यक पाई गई। इसी सर्वे में दो हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में मरम्मत कार्यों के लिए विशेष बजट 175 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए हैं और इन्हीं पर तेजी से कार्य चल रहा है ताकि मानसून से पहले सुधार हो सके। शिकायतें भी ऐसी, कहीं घटिया सामग्री का उपयोग किया गया तो कहीं छत की ढलान और ड्रेनेज की मूल समस्या सुधारे बिना सिर्फ सतही लेप कर दिया गया। मरम्मत या वाटरप्रूफिंग केवल बजट खर्च करने का नाम नहीं है, यह बच्चों के सुरक्षित वातावरण की गारंटी है। स्कूल प्रधान तकनीकी निरीक्षक नहीं होते, फिर भी उनसे कार्य की पूर्णता प्रमाणित करने की उम्मीद करना अनुचित है।

सरकारी स्कूलों में चल रहे वाटरप्रूफिंग और मरम्मत कार्यों को लेकर एक गंभीर आरोप उभर रहा है, ठेकेदारों की मिलीभगत और उस पर विभागीय इंजीनियरों की निगरानी। यदि निगरानी व्यवस्था मौजूद है, तो फिर अधूरे और घटिया कार्यों की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल है। यदि यह सब इंजीनियरों की निगरानी में हो रहा है, तो या तो निरीक्षण में लापरवाही है या फिर प्रणाली में कहीं न कहीं सांठगांठ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि निगरानी ही संदेह के घेरे में हो तो व्यवस्था की नींव कमजोर हो जाती है। ठेकेदारों और इंजीनियरों की संभावित मिलीभगत केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार के साथ समझौता है। स्कूलों की मरम्मत का कार्य सराहनीय है, लेकिन जहां-जहां शिकायतें आ रही हैं, वहां यह साफ संकेत है कि केवल बजट आवंटन पर्याप्त नहीं। गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना मरम्मत कार्य स्थायी समाधान नहीं दे पाएंगे। कोशिश तो तब ही कामयाब होगी जब स्कूलों की मरम्मत का काम सही ढंग से होगा। सरकार को इसकी मॉनिटरिंग पर ध्यान देकर गड़बड़ी करने वालों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।

Prateek Chauvey
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माननीय प्रतीक चौबे जी(Prateek Chauvey ) द्वारा प्रस्तुत यह मंच जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा भरने का प्रयास है। यहाँ दी गई जानकारी आपकी व्यक्तिगत और व्यावसायिक यात्रा में सहायक होगी, आपको नई सोच के साथ बदलाव और सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करेगी।
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