US Iran Conflict History : लॉन्ग बीच। ऐसा लग सकता है कि अमेरिका और पश्चिम एशिया एक और अंतहीन युद्ध की ओर अग्रसर हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह दोनों देशों के बीच 1980 के दशक से चले आ रहे एक अघोषित सैन्य संघर्ष की नवीनतम कड़ी मात्र है। अमेरिकियों के लिए, युद्ध की शुरुआत 1979 में हुई, जब ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और 52 राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। ईरानियों के लिए, इसकी शुरुआत शाह को अमेरिकी समर्थन और उसके बाद 1980-1988 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान इराक को दिए गए समर्थन से हुई। इस संघर्ष में अनेक नागरिकों की जान गई है। तीन जुलाई 1988 को अमेरिकी युद्धपोत विन्सेनेस ने दुबई जा रही ईरान की उड़ान को मार गिराया।
यूएसएस विन्सेनेस ने एयरबस को गलती से सैन्य विमान समझ लिया और उसे मार गिराया, जिसमें सवार सभी 290 लोग मारे गए। हाल में, 28 फरवरी 2026 को, अमेरिकी-इजराइली मिसाइल ने दक्षिणी ईरान के एक बालिका स्कूल को निशाना बनाया, जिसमें 150 से अधिक नागरिक मारे गए, जिनमें अधिकतर बच्चियां थीं। ईरान ने आठ जनवरी, 2020 को यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस की उड़ान संख्या 752 को भी मार गिराया था। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने नागरिक विमान को गलती से अमेरिकी सैन्य विमान समझ लिया और दो सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें दागीं। इसमें सभी 176 यात्री मारे गए, जिनमें ज्यादातर ईरानी नागरिक थे। दोनों पक्षों ने अलग-अलग समय पर तनाव बढ़ने की स्थिति में विनाशकारी गलतियां की हैं। लेकिन ये दुखद घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं। ईरान और अमेरिका-दोनों देशों के लोगों और सरकारी संस्थानों के बीच यह धारणा और भी मजबूत हो गई है कि इन दोनों देशों के बीच कभी वास्तविक शांति स्थापित नहीं हो सकती।

1980 के दशक में टैंकर युद्ध
1984 में, इराक ने ईरान के साथ ‘टैंकर युद्ध’ की शुरुआत की, जब उसकी वायु सेना ने ईरानी बंदरगाहों की ओर जा रहे तेल टैंकरों पर हमला किया। यह टैंकर युद्ध कई वर्षों तक चला और अंततः इसमें अमेरिकी नौसेना भी तब शामिल हो गई, जब 17 मई 1987 को एक इराकी विमान ने अमेरिकी फ्रिगेट ‘द स्टार्क’ पर गलती से हमला कर दिया जिसमें चालक दल के 37 सदस्य मारे गए। अमेरिका ने इराक से ध्यान हटाकर ईरान पर केंद्रित करने का विकल्प चुना और यह तर्क दिया कि इस्लामी गणराज्य इसके लिए जिम्मेदार था क्योंकि वह युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत करने में विफल रहा था। इसके बाद अमेरिका ने फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कुवैती तेल टैंकरों को अमेरिकी झंडा लगाकर उन्हें नौसैनिक सुरक्षा प्रदान की। लेकिन हिंसा और भी बढ़ गई।
ईरान ने अमेरिकी ध्वज वाले जहाजों को निशाना बनाया, और अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरानी अपतटीय प्लेटफार्मों और रिवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली स्पीडबोटों पर हमला किया। इसके अलावा, अमेरिका ने दो ईरानी फ्रिगेट को डुबो दिया, जिससे ईरान की आधी नौसेना नष्ट हो गई। इन्हीं संघर्षों के बीच ईरान एयर की उड़ान संख्या 655 को मार गिराया गया था। युद्ध के इस अंधकारमय माहौल में यह घटना कैसे घटी, यह आज भी गहन बहस का विषय है। ईरानियों के लिए, इस हमले ने इस बात की पुष्टि कर दी कि वे अमेरिका के साथ एक तरह के युद्ध में उलझे हुए हैं, जिसे वे 1979 के बंधक संकट का परोक्ष प्रतिशोध मानते थे। अंततः, विमान को गिराए जाने के बाद ईरान ने उस युद्धविराम को स्वीकार कर लिया जिससे ईरान-इराक युद्ध समाप्त हुआ। इराक के साथ ईरान का संघर्ष तो समाप्त हो गया, लेकिन अमेरिका के साथ उसका युद्ध समाप्त नहीं हुआ।
2000 के दशक में छद्म और जमीनी जंग
इस युद्ध का 1980 के दशक का चरण खाड़ी में नौसैनिक जहाजों द्वारा लड़ा गया था, लेकिन दूसरा चरण जमीन पर लड़ा गया एक छद्म संघर्ष था। साल 2001 के बाद जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने इस्लामी गणराज्य को खतरनातक देशों के समूह में शामिल किया, जिसमें इराक और उत्तर कोरिया भी शामिल थे। मार्च 2003 में, बुश के नेतृत्व में इराक पर आक्रमण के बाद, ईरान ने अचानक अपनी दो सीमाओं (इराक और अफगानिस्तान) पर अमेरिकी सैनिकों को पाया। तेहरान को डर था कि बुश प्रशासन सत्ता परिवर्तन की कोशिश करेगा और अमेरिका या इज़राइल उसके परमाणु संयंत्रों पर बमबारी करेंगे। ईरान के पास मौजूद विकल्पों में से एक था अमेरिकी सेना को निशाना बनाने के लिए विभिन्न इराकी विद्रोहियों का समर्थन करना। 2006 में गठित असाइब अहल अल-हक इसी तरह का समूह था जिसने अमेरिकी सैन्य वाहनों को आईईडी से निशाना बनाया और राजमार्गों पर अमेरिकी नियंत्रण को चुनौती दी। यह कम तीव्रता वाला संघर्ष 2011 में अमेरिकी सेनाओं के इराक छोड़ने के बाद ही समाप्त हुआ।
साल 2010 और 2020 के दशक के इराक पर हवाई युद्ध
साल 2010 के दशक के दौरान, ओबामा प्रशासन ने आईएसआईएस से लड़ने के लिए इस्लामी गणराज्य के साथ एक तरह का गठबंधन किया। अमेरिका ने हवाई सुरक्षा प्रदान की जबकि ईरान ने इराकी शिया मिलिशिया के साथ मिलकर ज़मीनी स्तर पर लड़ाई लड़ी। अक्टूबर 2017 में, आईएसआईएस के इराक और सीरिया में अपने अधिकांश क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर खोने से दो महीने पहले, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग करने की घोषणा की और इस्लामी गणराज्य पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए। तेहरान द्वारा इराक में अमेरिकी सेना को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई करने से संबंध तेजी से बिगड़ गए, जिससे हवाई युद्ध छिड़ गया। ईरान समर्थित मिलिशिया, कतैब हिजबुल्लाह ने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर रॉकेट दागे और अमेरिका ने हवाई हमलों से जवाबी कार्रवाई की।
31 दिसंबर 2019 को, बगदाद के ग्रीन ज़ोन में स्थित अमेरिकी दूतावास पर मिलिशिया से जुड़े इराकी प्रदर्शनकारियों ने धावा बोल दिया। 1979 के बंधक संकट की याद दिलाने वाली परिस्थितियों को देखते हुए, ट्रंप ने तीन जनवरी 2020 को एक ड्रोन हमले का आदेश दिया, जिसमें ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कुद्स फोर्स के कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी और साथ ही मिलिशिया के नेता अबू महदी अल-मुहंदिस मारे गए। ईरान ने आठ जनवरी को अमेरिकी सेना के दो इराकी ठिकानों पर 22 फतेह बैलिस्टिक मिसाइलें दागकर जवाबी कार्रवाई की।
सुलेमानी की मौत वह पहला मामला था जब अमेरिका ने सीधे तौर पर किसी वरिष्ठ ईरानी सरकारी अधिकारी की हत्या की थी। ईरान ने आम तौर पर अमेरिका पर हवाई हमलों में संयम दिखाया। उदाहरण के लिए, 2025 के 12 दिवसीय इज़राइल-ईरान युद्ध के दौरान, उसने कतर के अल-उदैद एयरबेस पर एक सुनियोजित सैन्य हमला किया, जहां अमेरिकी सेनाएं तैनात थीं। साल 2015 का ईरान समझौता दोनों देशों के बीच 1980 के दशक में शुरू हुए संघर्ष को समाप्त करने का पहला प्रयास था। यह समझौता बराक ओबामा की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। हालांकि, ट्रंप अपने पूर्ववर्ती की नीतियों को पलटने पर तुले हुए हैं।




