प्रतीक चौवे, संपादक
ACB Trap Action : जयपुर नगर निगम के दो पशु चिकित्सक व एक संविदाकर्मी को चार लाख की घूस लेते पकड़ा गया तो अजमेर डिस्कॉम के अधीक्षण अभियंता पचास हजार की रिश्वत लेते धरे गए। घूसखोरी कम नहीं हो रही, पर एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) की सख्ती का भी कोई खासा असर नहीं दिख रहा। एसीबी भले ही अधिकारियों और कर्मचारियों को रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद इन भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती है। ऐसा इसलिए कि इन भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति यानी मुकदमे की मंजूरी नहीं मिलती। अप्रेल 2019 से मई 2024 के बीच 182 अधिकारी/कर्मचारी भ्रष्टाचार और घूस लेने के आरोप में पकड़े गए।
एसीबी ने 1 जनवरी 2022 से 31 दिसंबर 2024 के दौरान एसीबी ने 1592 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति मांगी और इनमें 1189 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मिली जबकि 403 मामलों में स्वीकृति नहीं मिली। यह स्वीकृति मिलने तक कोर्ट में मुकदमा शुरू नहीं हो सकता। यानी अधिकारी/कर्मचारी पकड़े जाने के बावजूद कई मामलों में मुकदमा ही नहीं चला पाता। इनमें 180 मामले ऐसे है जिनमें अधिकारियों-कर्मचारियों को रंगे हाथ रिश्वत लेते हुए एसीबी ने ट्रैप किया, लेकिन ट्रैप करने के बावजूद एसीबी को जांच की अनुमति नहीं मिली है। ये संख्या केवल एसीबी की कार्रवाई में पकड़े गए मामलों पर आधारित है। अलग-अलग विभागों या एसओजी/विशेष जांच दल के अन्य भ्रष्टाचार मामलों के आंकड़े शामिल नहीं हैं।
जब एसीबी रंगे हाथ पकड़ती है, तो साक्ष्य मजबूत होते हैं। इसके बावजूद यदि स्वीकृति समय पर नहीं मिले तो यह साफ हो जाता है कि आरोपी को बचाने की कोशिश की जा रही है। अधिकांश मामलों में यही होता है कि ट्रैप में पकड़े गए कर्मचारी/अधिकारी कुछ ही दिनों में जमानत पर बाहर आ जाते हैं और थोड़े समय बाद फिर से ड्यूटी पर। कार्रवाई की शुरुआती सख्ती का असर अदालत से जमानत मिलते ही कमजोर पड़ जाता है। अभियोजन स्वीकृति की फाइल विभाग से विधि विभाग, फिर कार्मिक या संबंधित मंत्रालय तक घूमती रहती है। आपत्तियां लगती हैं, स्पष्टीकरण मांगे जाते हैं, और महीनों निकल जाते हैं। जिस विभाग के अधिकारी पर आरोप है, वही विभाग स्वीकृति देने वाला होता है। ऐसे में निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अक्सर तर्क दिया जाता है कि साक्ष्य पर्याप्त नहीं या प्रक्रिया में त्रुटि है। इससे फाइलें बार-बार लौटाई जाती हैं। स्वीकृति देने या न देने की कोई सख्त समयसीमा नहीं। न ही देरी पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय होती है। ऐसे में अदालत में मुकदमा शुरू ही नहीं हो पाता। आरोपी जमानत पर बाहर रहते हैं और कई बार सेवा में भी लौट आते हैं। जनता में यह संदेश जाता है कि “सिस्टम अपने लोगों को बचा रहा है। एसीबी जैसी एजेंसियों का मनोबल प्रभावित होता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई आधी तब तक रहेगी, जब तक घूसखोर को वास्तविक और समय पर सजा नहीं मिलेगी। सजा मिलेगी तब ही डर पैदा होगा और लोग इससे दूर होंगे। घूसखोरों को बचाने के तमाम रास्ते/उपाय बंद किए जाने चाहिएं।




