प्रतीक चौवे, संपादक
सरकारी अमला गैस की कालाबाजारी रोकने पर जुटा हुआ है। गैस न जमा करने देंगे न ब्लैक होगी। मिलावटी सामान बाजार में बिकेगा नहीं, अपराध को पूरी तरह, खत्म कर रहे हैं। एसएमएस अस्पताल समेत प्रदेश के सभी चिकित्सा संस्थानों में मरीजों को कोई तकलीफ नहीं होगी। मुफ्त दवाएं भी उपलब्ध रहेंगी। इस तरह की घोषणाएं-वादे समय-समय पर सुनने में आते हैं। जनता भी यही सोचती है कि सबकुछ सही होने की दिशा में है। कभी सड़क हादसे कम करने के लिए योजना-घोषणा की जाती है तो कभी प्रदूषण कम करने के लिए। मुख्यमंत्री ने अलबर्ट हाल पर श्रमदान कर स्वच्छता का संदेश दिया है। सरकार के प्रयास हो रहे हैं, इससे कोई मना नहीं करता पर उसके आदेश-निर्देश पूरी तरह लागू क्यों नहीं होते? पूरे प्रदेश में पिछले दिनों सड़कों की मरम्मत का काम खूब जोर-शोर से चला, बावजूद इसके बहुत सी सड़कें छोड़ दी गईं या वो इसके लिए चुनी ही नहीं गईं। असल में सरकार के अच्छे काम भी इसलिए सवाल के घेरे में आ जाते हैं कि नौकरशाह कहीं न कहीं खामियां छोड़ ही देते हैं। समय-समय पर मीटिंग की परंपरा चली आ रही है, अफसरों को पाबंद भी किया जाता है पर ये सब बेअसर हो चुका है। इस कान से सुनो और दूसरे से निकालो वाला हाल है। हर विभाग के मुखिया की जिम्मेदारी होती है कि वो अपने अधीन अफसर कर्मचारियों की मॉनिटरिंग करे, गलत काम को रोके, जनहित को प्राथमिकता दे। इसके बाद भी यह सब हो नहीं रहा। एक चेन सिस्टम से अब आदेश को सरकाने का काम किया जाता है, उस पर काम हुआ या नहीं, इसे कोई नहीं देखता। वो शिकायत अतिक्रमण की हो या अवैध निर्माण की।
नीरजा मोदी स्कूल में छात्र की आत्महत्या का प्रकरण सबको पता है, उस समय तरह-तरह के आदेश-निर्देश जारी किए गए, अब उनकी पालना हो रही है या नहीं, यह कौन देखेगा। स्कूलों का नया सत्र शुरू हो रहा है, निजी स्कूलों की मनमानी फीस हो या अन्य शुल्क, इसकी शिकायत भी तो सामने आ रही है पर ध्यान कौन दे। नियमों के हिसाब से स्कूल-कॉलेज चलने चाहिएं, बावजूद इसके गैर कानूनी ढंग से चलाए जा रहे हैं। ट्रैफिक पुलिस नो पार्किंग और यातायात व्यवस्थित करने का जिम्मा लिए घूमती तो रहती है पर इसके मुताबिक काम ही नहीं कर पाती। जलदाय विभाग को अवैध बूस्टर चलाने की शिकायत मिलती है पर चेक करने की जहमत ही नहीं उठाता। आखिर मिलीभगत है या काम नहीं करने की आदत। रोड लाइट के लिए बार-बार शिकायत करो, ठीक कब होती-इसकी अवधि का कोई ठिकाना नहीं। शनिवार को सीएम भजनलाल ने अलबर्ट हाल में स्वच्छता का संदेश दिया। सफाई कर्मियों को पीपीई किट बांटी। सीएम ने सफाई के प्रति लोगों को जागरूक किया। बावजूद इसके प्रदेश की राजधानी जयपुर में ही कई इलाके ऐसे हैं जहां सफाई ठीक-ढंग से हो ही नहीं रही। आखिर जिम्मेदार अफसर कर क्या रहे हैं?
अब गैस एजेंसियां सिलेंडर बुक नहीं कर रहीं या फिर काला बाजारी हो रही है, इसको पूरी तरह रोकेगा कौन? इक्का-दुक्का कार्रवाई से यह सब पूरी तरह नहीं रुकने वाला। सरकार को संबंधित अधिकारियों को साफ चेतावनी देनी होगी। गैस एजेंसी सरकार को कह रही हैं कि सबकुछ ठीक है, इसके बाद भी जनता की परेशानियां तो समझनी होगी। अदालती आदेश के बाद थाने से बाइक छुड़ाने वाले पीड़ित को जब पुलिसकर्मी फोटो लेकर अगले दिन आने की कहें तो समझा जा सकता है कि ये हो क्या रहा है? एसएमएस जैसे अस्पताल में मरीज को भर्ती कराने के लिए एप्रोच लगानी पड़ती है। जेडीए-नगर निगम में छोटे-छोटे काम के लिए धक्के खाने पड़ते हैं, जायज काम के लिए भी जब घूस देनी पड़ जाए, एफआईआर लिखने में जब पुलिस आनाकानी करे या फिर किसी विभाग के अफसर फरियादी को ही डांट-फटकार के भगा दें तो क्या कहा जा सकता है। बिजली विभाग को ही देख लीजिए, करोड़ों का बकाया उपभोक्ता पर चल रहा है, उपभोक्ता एक्सईएन-एईएन के पास जाते हैं कि मामला लोक अदालत में भेजकर निस्तारित करा दो तो उन्हें फटकार कर वापस भेज दिया जाता है। विभाग कोई भी हो जनता की सुनवाई के लिए होता है, जनता के टैक्स से ही अफसरों को पगार मिलती है। इसके बाद भी उसे हाशिए पर धकेल दिया जाए तो क्या कहा जा सकता है? जनता की सुनवाई हो, जब सरकार समय-समय पर आदेश-निर्देश देती है तो उसकी पालना क्यों नहीं होती, यह भी देखा जाए।




