प्रतीक चौवे, संपादक
संसद के बजट सत्र के दूसरे फेज का पहला दिन भी हंगामे में ही बीता। सरकार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना चाहती थी पर विपक्ष ईरान जंग के मुद्दे पर अड़ा हुआ था। लोकसभा-राज्यसभा में यही होता रहा, सदन के बाहर भी बैनर के साथ विपक्षी सांसदों ने विरोध जताया। बजट का पहला सत्र भी लगभग ऐसे ही बीता था। तब भी विपक्ष जिन मुद्दे पर चर्चा करना चाह रहा था, उसे नजरअंदाज किया गया। ऐसे में स्पीकर ओम बिरला पर विपक्ष के साथ गलत व्यवहार करने का आरोप लगा और उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कवायद हुई। जिद विपक्ष की हो या सत्ता पक्ष की, नुकसान तो जनता को ही उठाना पड़ रहा है। लोकसभा की कार्यवाही बार-बार हंगामे और शोर-शराबे की भेंट चढ़ जाती है तो सवाल तो खड़े होंगे ही। दरअसल संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब यह टकराव संवाद की जगह शोर में बदल जाए तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है। देश की लोकसभा और राज्यसभा लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण मंच हैं। यहां देश की नीतियां बनती हैं, कानून तैयार होते हैं और जनता से जुड़े मुद्दों पर बहस होती है। लेकिन जब संसद की कार्यवाही बार-बार हंगामे की भेंट चढ़ जाती है, तो सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता को होता है।
वजह साफ है-संसद का हर मिनट जनता के पैसे से चलता है और उस पर लाखों रुपए खर्च होते हैं। संसद का संचालन कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। इसमें सांसदों के वेतन-भत्ते, सुरक्षा व्यवस्था, कर्मचारियों का वेतन, संसदीय संसाधन और अन्य व्यवस्थाओं पर भारी खर्च होता है। ऐसे में जब सदन की कार्यवाही हंगामे के कारण बार-बार स्थगित होती है, तो यह खर्च व्यर्थ चला जाता है। जनता के टैक्स से चलने वाली इस व्यवस्था का उद्देश्य सार्थक बहस और नीति निर्माण है, न कि शोर-शराबा। बहस और तर्क की जगह नारेबाजी, पोस्टरबाजी और वेल में आकर विरोध करना आम होता जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव इतना बढ़ जाता है कि कई बार पूरे दिन की कार्यवाही ही बाधित हो जाती है। ऐसे में महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चाएं अधूरी रह जाती हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजती है, तो उसकी उम्मीद होती है कि वे उसकी समस्याओं को उठाएंगे और समाधान तलाशेंगे। लेकिन यदि समय हंगामे में बीत जाएगा, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। संसद केवल राजनीतिक संघर्ष का मंच नहीं, बल्कि संवाद और समाधान का स्थान है। संसद के बजट सत्र के दूसरे फेज के पहले दिन भी लगभग यही हुआ। स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होनी थी जबकि विपक्ष ईरान युद्ध से खाड़ी देशों में फंसे भारतीय सहित अन्य संकट पर बात करना चाहता था। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कुछ हद तक जानकारी दी भी पर विपक्ष इस पर भी नारेबाजी करता रहा, राज्यसभा में तो वॉक आउट तक कर गया।
लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सरकार से सवाल पूछे, गलत नीतियों का विरोध करे और जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाए। उसी तरह सरकार का कर्तव्य है कि वह विपक्ष की बात सुने और गंभीर मुद्दों पर चर्चा के लिए मंच उपलब्ध कराए। यदि बहस होगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा, लेकिन जब बहस की जगह केवल शोर और टकराव रह जाए, तो संसद का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब विपक्ष के तीखे विरोध के कारण सरकार को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ा। इसलिए विरोध को पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन विरोध का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक प्रदर्शन। आज जरूरत इस बात की है कि संसद में संतुलन कायम किया जाए-जहां बहस भी हो, असहमति भी हो और जरूरत पड़ने पर विरोध भी दर्ज हो, लेकिन यह सब लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर हो। आखिरकार संसद किसी दल की नहीं, पूरे देश की संस्था है। विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, दोनों को यह तो ध्यान रखना चाहिए कि जिस जनता के वोटों पर आप वहां पहुंचे हो, उसके ही हितों का नजर अंदाज कर क्या साबित करना चाहते हो। जिम्मेदारी निभाइए, वरना विरोध-हंगामा तो जनता भी करना जानती है।




