संपादक: प्रतीक चौवे
कहीं पानी की किल्लत तो कहीं दूषित जल। बावजूद इसके हर साल की तरह इस बार भी विश्व जल दिवस मनाया गया। बूंद-बूंद बचाने का ज्ञान बांटा गया। रैलियां भी हुईं तो कार्यशाला भी। फ्लोराइड में राजस्थान टॉप पर है। जहां सरकार घर-घर नल कनेक्शन की कवायद में लगी है वहीं शुद्ध पानी को लेकर भी संकट है। दूषित पानी के सेम्पल लिए जाते हैं तो रिपोर्ट आने में ही अरसा बीत जाता है। ऐसे में सवाल तो उठता ही है कि जल को लेकर आने वाला कल सुरक्षित है भी या नहीं। पानी बेचते टैंकर यह बताने के लिए काफी हैं कि अभी भी काफी लोगों को सरकार ने पेयजल योजना से नहीं जोड़ा गया है। उन्हें महंगा पानी पीना पड़ रहा है। कहीं पाइप लाइन बिछ गई पर पेयजल सप्लाई नहीं हुआ तो कहीं पाइप लाइन जर्जर हो चुकी पर बदली ही नहीं जा रही। कई जिलों में भूजल में फ्लोराइड, नाइट्रेट और लवणता की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। यह केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और नीति विफलता का आईना भी है। फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस जैसी बीमारियां आम हो चुकी हैं। कई घरों में आज भी नल से नियमित पानी नहीं पहुंचता। बड़ी संख्या में लोग हैंडपंप, कुएं या टैंकर पर निर्भर हैं। पानी की गुणवत्ता पर भरोसा कम है। पेयजल संकट केवल “पानी की कमी” का नहीं, बल्कि “प्रबंधन की विफलता” का परिणाम है।
योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है, लेकिन नतीजे जमीन पर नहीं दिख रहे। कई जगह पर नल से जो पानी आ रहा है, वह या तो पीने लायक नहीं है या फिर नियमित आपूर्ति ही नहीं हो रही। परंपरागत तालाब, बावड़ियां और जोहड़ जो कभी राजस्थान की पहचान थे, वे या तो खत्म हो गए हैं या उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन को लेकर जागरूकता और क्रियान्वयन की कमी है। जलदाय विभाग की ढिलाई ऐसी, न अवैध कनेक्शन काटे जाते हैं न ही बकाया वसूली होती है। सिस्टम ऐसा कि अवैध बोरिंग माफिया चांदी कूट रहे हैं। शिकायत करने पर कार्रवाई नहीं होती। राजधानी जयपुर में ही कई कॉलोनियों में पाइप लाइन बिछे अरसा हो गया पर नल कनेक्शन आज तक नहीं हुए। बताया जाता है कि दूषित पानी पीने से देशभर में एक साल में 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, अकेले इंदौर में भागरीथ पुरा इलाके में दूषित पानी पीने से करीब दो दर्जन लोगों की जान गई। केवल पाइपलाइन बिछा देना समाधान नहीं है। हर स्तर पर जल परीक्षण अनिवार्य किया जाए-गांव स्तर तक छोटी-छोटी टेस्टिंग यूनिट्स स्थापित हों। फ्लोराइड और नाइट्रेट प्रभावित क्षेत्रों में विशेष शुद्धिकरण संयंत्र लगाए जाएं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, न कि केवल कागजी औपचारिकता।
हर साल मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि दुनिया को पानी के बढ़ते संकट के प्रति सचेत करने का प्रयास है। इसका उद्देश्य लोगों, सरकारों और संस्थाओं को यह याद दिलाना है कि जल संसाधन सीमित हैं और उनका संरक्षण अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। यह दिवस सरकार को यह भी याद दिलाता है कि पेयजल योजना से दूर लोगों को राहत दे, शुद्ध पानी घरों तक पहुंचे, इसका इंतजाम पुख्ता किया जाए। जब तक पानी का स्रोत ही स्थायी नहीं होगा, तब तक सप्लाई की कोई भी व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती। वर्षा जल संचयन को हर गांव और शहर में अनिवार्य बनाना होगा। पुराने तालाब, बावड़ियां और जोहड़ जो कभी जल भंडारण के मजबूत आधार थे, उनका पुनर्जीवन प्राथमिकता बने। भूजल का अंधाधुंध दोहन रोकने के लिए सख्त नियम लागू करने होंगे। केवल दिवस विशेष कार्यक्रम आयोजित कर देने से पेयजल की परेशानियों का निस्तारण नहीं होगा। लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा, पानी की बर्बादी को रोकने के लिए।




