प्रतीक चौवे, संपादक
कभी स्कूल तो कभी कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिल रही है। ई-मेल के जरिए मिलने वाली धमकियां कोई नई बात नहीं है। पिछले चार-पांच महीने से देशभर में यही हो रहा है। दिल्ली से लेकर देहरादून या फिर जयपुर से लेकर मुंबई तक, आए दिन होने वाले इस धमकी के धमाके ने आमजन को ‘दहला’ रखा है। सबसे मजे की बात यह कि जहां देश एआई क्षेत्र में तरह-तरह के कीर्तिमान के दावे कर रहा है वहां इस तरह के धमकी भरे मेल करने वालों की अब तक पहचान भी नहीं हो पाई है।
इन धमकियों से हजारों लोग परेशान हो रहे हैं, कभी कोर्ट का काम ठप पड़ जाता है तो कभी स्कूल बंद करना पड़ता है। विमान तक को बम से उड़ाने की धमकी दी जा रही है, आखिर यह तमाशा कब तक चलेगा। ईमेल या सोशल मीडिया के जरिए भेजी जा रही ये धमकियां हर बार हड़कंप मचा देती हैं, बच्चों को घर भेज दिया जाता है, अदालतों की कार्यवाही स्थगित हो जाती है। सुरक्षा एजेंसियां घंटों तलाशी अभियान चलाती हैं, लेकिन अंत में धमकी फर्जी निकलती है। सवाल यह है कि जब यह सिलसिला इतना लंबा खिंच चुका है, तो आखिर दोषी पकड़ में क्यों नहीं आ रहे? यह उन तमाम एजेंसियों पर तमाचा है, जिनकी जिम्मेदारी ही इनका पता लगाने की होती है।रोजाना यही हो रहा है, धमकी के बाद सनसनी और फिर सबकुछ सामान्य।
तकनीकी रूप से देखें तो साइबर ट्रैकिंग के कई साधन उपलब्ध हैं। पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के पास डिजिटल फॉरेंसिक की सुविधाएं हैं। फिर भी बार-बार धमकी देने वाले तत्वों तक न पहुंच पाना चिंता का विषय है। क्या यह जांच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है? क्या तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं है? या फिर साइबर अपराधी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क और फर्जी ईमेल सर्वरों के जरिए अपनी पहचान छिपाने में सफल हो रहे हैं? इन सभी बिंदुओं की समीक्षा होनी चाहिए। सबसे अधिक चिंता का विषय बच्चों और अभिभावकों की मानसिक स्थिति है। बार-बार स्कूल खाली कराना, कक्षाएं स्थगित होना और डर का माहौल बनना शिक्षा के वातावरण को प्रभावित करता है।
अदालतों में धमकी से न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है, जो पहले से ही लंबित मामलों के बोझ से दबी है। यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्थिर करने का प्रयास भी मानी जा सकती है। स्कूलों, अदालतों और सार्वजनिक संस्थानों को बम से उड़ाने की झूठी धमकियों का सिलसिला केवल दहशत ही नहीं फैलाता, बल्कि प्रशासन पर भारी आर्थिक बोझ भी डालता है। हर बार जब कोई ईमेल या फोन कॉल के जरिए धमकी मिलती है, तो पूरा सुरक्षा तंत्र सक्रिय हो जाता है-पुलिस बल, बम निरोधक दस्ता, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस, खुफिया इकाइयां-सभी को तत्काल मौके पर पहुंचना पड़ता है। घंटों तक तलाशी अभियान चलता है। यह सब केवल अफवाह साबित होने के बाद समाप्त होता है, लेकिन तब तक लाखों रुपए का खर्च हो चुका होता है।
एक फर्जी धमकी के बाद किसी स्कूल को खाली कराने की प्रक्रिया में शिक्षकों और विद्यार्थियों का समय नष्ट होता है। अदालतों में सुनवाई स्थगित होने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। सरकारी संसाधनों की यह बर्बादी उस देश के लिए और गंभीर है, जहां पुलिस बल पहले ही संसाधनों और कर्मियों की कमी से जूझ रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब धमकी देने के मामलों को रूटीन की तरह देखा जाने लगा है। धमकाने वालों पर कार्रवाई करने की तमाम कोशिशें बंद कर दी गई हों। ऐसा भी हो सकता है कि अब रोजाना इसे अफवाह समझा जाए। बार-बार धमकी देने वालों तक हमारा सिस्टम नहीं पहुंच पा रहा तो इसका जिम्मेदार कौन है?




