प्रतीक चौवे, संपादक
अंकिता भण्डारी की हत्या के करीब तीन साल बाद भी आंदोलन जारी है। अंकिता के पिता कह रहे हैं कि जब वो खुद वीआईपी के आगे नहीं झुकी तो मैं क्यों झुकूं। रविवार को इसके लिए देहरादून के परेड ग्राण्ड में महापंचायत भी हुई। लोगों की भीड़ यह बताने के लिए काफी थी कि अंकिता को पूरा न्याय नहीं मिल पाया है। सरकार की ओर से दिया गया आश्वासन पूरा नहीं हुआ। महापंचायत की सबसे बड़ी मांग थी कि पूरे मामले की सीबीआई से दोबारा जांच कराई जाए, ताकि राज्य पुलिस की जांच पर उठ रहे संदेह दूर हो सकें। जिस वीआईपी का नाम आया उसे सार्वजनिक किया जाए, साथ ही सिर्फ सीबीआई जांच ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी प्रक्रिया चलाने की मांग रखी गई, ताकि निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे।
अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की 19 वर्षीय युवती थी, जो ऋषिकेश के पास वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थी। यही नौकरी उसकी मौत की वजह बन गई। रिसॉर्ट में आने वाले कुछ “खास मेहमानों” को खुश करने के लिए अंकिता पर अनैतिक दबाव डाला गया। उस पर स्पा/वीआईपी सेवा के नाम पर ऐसे काम के लिए मजबूर करने की कोशिश हुई, जिसे उसने साफ़ मना कर दिया। अंकिता ने यह बात अपने दोस्तों और परिजनों से फोन पर साझा भी की थी। रिसॉर्ट एक भाजपा नेता का था, उसके पुत्र ने अपने साथियों के साथ अंकिता की हत्या कर दी। तीनों आरोपियों को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुना दी, बावजूद इसके आंदोलन जारी है। वो इसलिए कि जिस वीआईपी के लिए दबाव डाला गया, उसकी पहचान आज तक सार्वजनिक नहीं हुई। हत्या के अपराधी तो सजा पा गए, लेकिन अपराध की वजह अभी भी अधूरी है। महापंचायत के जरिए आंदोलन ने नया रूप लिया। यह साफ कर दिया गया कि अब लड़ाई सिर्फ आरोपियों से नहीं, सिस्टम से है। अंकिता मामले में सबसे बड़ी चूक यही रही कि अपराध की वजह को पूरी तरह उजागर नहीं किया गया। रिसॉर्ट गिरा दिया गया। बड़े-बड़े बयान दिए गए, लेकिन न सच सामने आया, न संदेह दूर हुए। जब पीड़ित परिवार ही संतुष्ट नहीं, तो यह मान लेना कि न्याय हो गया, आत्मसंतोष के अलावा कुछ नहीं।
अंकिता जैसे कुछ मामले तो चलो सामने आ जाते हैं, आंदोलन होते हैं और सरकार दबाव में आती है पर न जाने कितनी लड़कियों को ऐसे ही मार दिया जाता है और उनकी चर्चा तक नहीं होती। सरकारें महिला सुरक्षा पर सख्त कानूनों का हवाला देती हैं। निर्भया के बाद कानून बदले, फास्ट-ट्रैक कोर्ट बने, सख्त सजा का प्रावधान हुआ। लेकिन महिलाओं को आज भी सुरक्षा कहां मिल पाई? महिला सुरक्षा पर कानूनों की कमी नहीं, कमी है भरोसे की। अंकिता भंडारी का मामला बताता है कि खतरा सड़कों पर नहीं, कार्यस्थलों के भीतर भी है। जब महिलाएं शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं, तो सिस्टम अक्सर चुप रहता है। महिला सुरक्षा का मतलब सख्त सजा नहीं, ऐसा माहौल है जहां ‘ना’ कहना जानलेवा न बने। अंकिता को आधा अधूरा न्याय मिला, पूरा कब मिलेगा, इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। बेटियों को कब पूरी सुरक्षा मिलेगी, इस सवाल का जवाब भी कोई नहीं दे रहा।




