Wednesday, March 18, 2026
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Bengal Elections 2026 : कल्याणकारी योजनाएं बनाम सत्ता-विरोधी लहर, पश्चिमी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की कठिन परीक्षा

तृणमूल कांग्रेस 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इंकम्बेंसी के बीच ममता बनर्जी के नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत संगठन के सहारे चुनावी मैदान में है। भाजपा की चुनौती, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और मतदाता सूची विवाद ने मुकाबले को कड़ा बना दिया है।

Bengal Elections 2026 : कोलकाता। सत्ता में रहने के 15 वर्ष बाद सत्ता-विरोधी लहर का सामना करते हुए और संगठन के भीतर संतुलित पीढ़ीगत बदलाव की कोशिश के बीच तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित सामाजिक गठजोड़, मजबूत जमीनी संगठन और ममता बनर्जी के नेतृत्व के सहारे मैदान में उतर रही है। हालांकि, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने चुनावी परिदृश्य बदल दिया है। वर्ष 2011 से राज्य की सत्ता में रही तृणमूल के लिए इस बार का चुनाव कड़ी परीक्षा है। उसे अब आक्रामक हो चुकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव अब कल्याणकारी राजनीति, बेरोजगारी और पहचान की राजनीति के मुद्दों पर केंद्रित हो गया है।

तृणमूल के अभियान का केंद्र उसकी कल्याणकारी योजनाएं हैं जिन्होंने बड़े लाभार्थी वर्ग को पार्टी से जोड़ा है। ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’ और ‘स्वास्थ्य साथी’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और कमजोर वर्गों से पार्टी का जुड़ाव मजबूत किया है। पार्टी ने बंगाली सांस्कृतिक पहचान पर भी जोर बढ़ाया है और खुद को राज्य की भाषाई एवं क्षेत्रीय पहचान का संरक्षक बताया है। ‘‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय’’ (बंगाल अपनी ही बेटी को चाहता है) जैसे नारों से लेकर संघीय ढांचे, अन्य राज्यों में बंगाली प्रवासियों पर हमलों और क्षेत्रीय गौरव जैसे मुद्दों को उठाकर तृणमूल चुनाव को बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बनाम भाजपा के ‘‘बाहरी नेताओं द्वारा संचालित राजनीति’’ के रूप में पेश कर रही है।

कल्याणकारी कार्यक्रमों और जमीनी स्तर के शासन मॉडल के प्रभाव को दर्शाती है: TMC

तृणमूल के वरिष्ठ नेता जयप्रकाश मजूमदार ने कहा कि पार्टी की चुनावी ताकत चुनावों में लगातार बढ़ती जा रही है, जो उसके कल्याणकारी कार्यक्रमों और जमीनी स्तर के शासन मॉडल के प्रभाव को दर्शाती है। हालांकि, 15 साल की सत्ता के बाद पार्टी को स्थानीय प्रशासन से असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और गुटबाजी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। इसी के तहत तृणमूल ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर उम्मीदवारों में बड़े पैमाने पर बदलाव किया है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह ‘‘नियंत्रित बदलाव’’ की रणनीति है, जिसमें संगठन को मजबूत रखते हुए नयी छवि पेश करने की कोशिश की गई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2019 के बाद से भाजपा के उभार ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज किया है। इसके जवाब में तृणमूल कल्याणकारी राजनीति के साथ बंगाली पहचान को जोड़कर संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा, मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विवाद भी चुनाव को प्रभावित कर सकता है। तृणमूल का आरोप है कि नाम हटाने से मतदाताओं के कुछ वर्गों को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है, खासकर उन जिलों में जहां उसे पारंपरिक रूप से मजबूत समर्थन प्राप्त रहा है।

मजूमदार ने कहा, ‘‘जब लोगों को लगता है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है, तो यह चिंता अन्य राजनीतिक मुद्दों पर हावी हो सकती है।’’ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह विवाद कई ऐसे जिलों में मतदाता लामबंदी की प्रवृत्ति को नया रूप दे सकता है जहां ऐतिहासिक रूप से चुनावी अंतर बहुत कम रहा है। तृणमूल ने 2021 के चुनावों में 215 से अधिक सीट जीतकर राज्य में भाजपा के विस्तार को रोक दिया था और भाजपा को हराने में सक्षम कुछ क्षेत्रीय नेताओं में से एक के रूप में ममता बनर्जी की छवि को मजबूत किया लेकिन इस बार सत्ता-विरोधी माहौल, भाजपा की चुनौती और मतदाता सूची विवाद ने मुकाबले को अनिश्चित बना दिया है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या तृणमूल अपनी कल्याणकारी नीतियों, संगठनात्मक ताकत और पहचान आधारित रणनीति के सहारे लगातार चौथी बार सत्ता हासिल कर पाती है।

Mukesh Kumar
Mukesh Kumarhttps://jagoindiajago.news/
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