प्रतीक चौवे, संपादक
तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी रूस-यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा। अफगानिस्तान-पाकिस्तान हवाई हमले और गोलीबारी चल रही है। गाज़ा–इज़राइल/फिलिस्तीन संघर्ष भी किसी से छिपा नहीं है। भारत-पाक के बीच चंद दिनों चले ऑपरेशन सिंदूर का भी सबको मालूम ही है। अब अमेरिका-इजरायल ने साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। जवाब ईरान भी दे रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह खामनेई इस युद्ध में मारे गए। ईरान के विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि कर दी तो उधर इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी खामनेई को मारने का दावा कर दिया।
इजरायल ने खामेनेई के परिसर पर 30 बम गिराए। कोई भी युद्ध केवल दो देशों या शक्तियों के बीच टकराव नहीं होता, वह मानव सभ्यता की आत्मा पर लगा घाव होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी हथियार बोले हैं, तब इंसानियत खामोश हुई है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को सिखाया कि युद्ध की आग सीमाओं में नहीं सिमटती। लाखों लोग मारे गए, करोड़ों बेघर हुए, और पीढ़ियों तक दर्द की विरासत चली। युद्ध का परिणाम वही पुराना है, विनाश, भय और अस्थिरता। युद्ध केवल सैनिकों का संघर्ष नहीं होता, यह आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी को भी तहस-नहस कर देता है। स्कूल खामोश हो जाते हैं, अस्पतालों पर दबाव बढ़ जाता है, और अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है।
बच्चों के सपने बारूद की गंध में खो जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसकी सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि उसकी शांति स्थापित करने की क्षमता होती है। संवाद, कूटनीति और आपसी समझ ही स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ईरान पर हमले के पहले ही दिन 85 छात्राओं की मौत हो गई, अब कोई पूछे कि इनका क्या दोष था। बहस इस बात पर भी हो रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनियाभर में तानाशाह का रवैया अपना रहे हैं। उनके इस रवैये से कई देश नाराज भी हैं। मनचाहे टैरिफ लगाकर देशों में दबाव बनाने की कूटनीति हो या दो देशों को एक-दूसरे के सामने लड़ाने की ‘साजिश’। ट्रंप यही सब करते दिख रहे हैं। और तो और भारत-पाक के बीच सीज फायर तक का कई बार क्रेडिट तक ले चुके हैं।उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि उनकी बदतौलत नौ युद्ध रुके, ऐसे में नोबल प्राइज के असली हकदार वे ही हैं।
खैर बात अकेले ट्रंप की नहीं है। युद्ध के कारण तलाशने और उसे खत्म करने की आवश्यकता होती है। ईरान वाले मामले में भी यही हो रहा है तो यूक्रेन भी रूस के आगे न झुक रहा है न ही शांति वार्ता को पूरी तरह तैयार है। दो देशों के युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों के बीच नहीं लड़े जाते। हवाई हमले, मिसाइलें, ड्रोन और साइबर हमले सीधे नागरिक ढांचे-स्कूल, अस्पताल, बिजली संयंत्र को प्रभावित करते हैं। ऐसे में आम नागरिक सुरक्षित नहीं रह पाते। देश के सर्वेसर्वा जब सबकुछ जानते हुए युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं, बड़े नुकसान की परवाह किए बगैर।




