रिपोर्टर : मनोज अवस्थी
जयपुर। आधुनिक तकनीक, स्मार्टफोन और वीडियो गेम्स के बढ़ते चलन के बीच भारत के पारंपरिक खेल धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। कभी गांवों, गलियों और मोहल्लों में बच्चों की पहली पसंद रहे ये खेल अब नई पीढ़ी से दूर होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन थे, बल्कि बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं ये खेल
कभी हर गांव और कस्बे में लोकप्रिय रहे कबड्डी, गिल्ली-डंडा, खो-खो, लंगड़ी, सतोलिया (पिट्ठू), कंचे, रस्साकशी और आंख-मिचौली जैसे खेल अब बहुत कम देखने को मिलते हैं। क्रिकेट और डिजिटल गेम्स के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों की रुचि इन पारंपरिक खेलों से लगातार कम होती जा रही है।
क्यों खत्म हो रहे हैं पारंपरिक खेल?
(1) मोबाइल और वीडियो गेम्स का बढ़ता प्रभाव।
(2) शहरीकरण के कारण खुले मैदानों की कमी।
(3) पढ़ाई और कोचिंग का बढ़ता दबाव।
(4) बच्चों का डिजिटल उपकरणों पर अधिक समय बिताना।
(5) पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त प्रयासों का अभाव।
बच्चों के विकास में अहम भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि ये खेल बच्चों में टीम भावना, नेतृत्व क्षमता, शारीरिक फिटनेस और मानसिक एकाग्रता विकसित करते थे। इसके साथ ही ये खेल सामाजिक समरसता और आपसी मेलजोल को भी बढ़ावा देते थे।
संरक्षण के लिए उठाने होंगे कदम
पारंपरिक खेलों को बचाने के लिए स्कूलों में पारंपरिक खेल दिवस आयोजित करने, ग्रामीण खेल प्रतियोगिताओं को बढ़ावा देने, बच्चों को आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रेरित करने और सरकार व सामाजिक संस्थाओं द्वारा पारंपरिक खेल महोत्सव आयोजित करने की जरूरत है।
सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता की पहचान हैं। यदि समय रहते इन्हें संरक्षित करने के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इन खेलों को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।



